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आम्रपाली को दिवालिया घोषित करने की प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और आम्रपाली को नोटिस जारी कर मांगा जवाब

LiveLaw News Network
6 Oct 2017 12:12 PM GMT
आम्रपाली को दिवालिया घोषित करने की प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और आम्रपाली को नोटिस जारी कर मांगा जवाब
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एक तरफ जहां आम्रपाली को दिवालिया घोषित करने की प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, आरबीआई, आम्रपाली और बैंक ऑफ बडौदा को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है तो मकान खरीदारों के हितों, अधिकारों की रक्षा को लेकर दाखिल याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इंकार कर दिया।

रियल इस्टेट फर्म आम्रपाली  में फ्लैट बुक कराने वाले एक सौ से अधिक खरीददारों ने अपने हितों की रक्षा की गुहार लगाते हुये सु्प्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है।  इन खरीददारों का अनुरोध है कि उन्हें भी बैंकों और वित्तीय संस्थानों की तरह ही सुरक्षित देनदार माना जाये। उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में आम्रपाली सेन्चूरियन पार्क-लो राइज परियोजना, आम्रपाली सेन्चूरियन पार्क-टेरेस होम्स और आम्रपाली सेन्चूरियन पार्क-ट्रापिकल गार्डन परियोजना में फ्लैट खरीदने वालों को न तो अभी तक घर मिले हैं और न ही इनमे निवेश की गयी उनकी गाढ़ी कमाई ही वापस मिली है। इन परियोजनाओं में चरणबद्ध तरीके से करीब 40 टावरों में पांच हजार से अधिक फ्लैट का निर्माण होना था।

याचिका बिक्रम चटर्जी और 106 अन्य खरीददारों ने दायर की है। इसमें आम्रपाली सिलकन सिटी  को दिवालिया घोषित करने के लिये बैंक आफ बड़ौदा के मामले में नेशनल कंपनी ला ट्रिब्यूनल का आदेश रद्द करने की मांग की गई है। ट्रिब्यूनल ने चार सितंबर को बैंक आफ बडोदा की याचिका पर इस फर्म के खिलाफ दिवालिया घोषित करने संबंधी कानून के तहत कार्रवाई शुरू करने का आदेश दिया था। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में रियल इस्टेट फर्म के खिलाफ दिवालिया घोषित करने की कार्रवाई शुरू होने के बाद धन वसूलने के लिये दीवानी अदालतों की डिक्री और उपभोक्ता आयोग के आदेशों पर अमल नहीं हो सकता है।

एक अन्य मामले में  मकान खरीदारों के हितों, अधिकारों की रक्षा को लेकर दाखिल याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करने से इंकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता को कहा कि इस पर वो सुनवाई नहीं करेंगे। बेंच ने ये भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट सभी खरीदारों के हितों को लेकर कदम उठा रहा है।

दरअसल वकील विवेक नारायण शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल कर कहा था कि बैंकों और वित्तीय संस्थाओं द्वारा रियल  एस्टेट फर्मों को दिवालिया घोषित करने के लिए कार्यवाही शुरू होने पर लाखों मकान खरीदारों के अधिकारों और वित्तीय हितों की रक्षा की जाए।

याचिका में दावा किया गया था कि नई दिवाला संहिता, 2016 में वित्तीय लेनदारों या सक्रिय लेनदारों की परिभाषा में मकान खरीदारों को शामिल नहीं किया गया है। मगर उन्हें लेनदारों की सूची में सबसे अंत में रखा गया है जिनके दावों का निपटारा दिवालिया घोषित करने की कार्यवाही के दौरान किया जाएगा।

इस याचिका में दिवाला संहिता के कुछ प्रावधानों की संवैधानिकता को चुनौती दी गई थी। साथ ही यह निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया है कि जिन मकान खरीदारों को अपने घर का कब्जा नहीं मिला है, वो भी ऐसी रियल एस्टेट कंपनी के खिलाफ कॉरपोरेट दिवाला प्रस्ताव प्रक्रिया शुरू करने की पात्रता रखते हैं।

इसमें यह भी कहा गया था। कि मकान खरीदारों की हिमायत करने वाले कानून रेरा के प्रावधानों को इस संहिता द्वारा सीमित नहीं किया जाना चाहिए.

इस समय रियल एस्टेट कंपनी के खिलाफ दिवालिया घोषित करने की कार्यवाही शुरू होने के साथ ही अदालतों और उपभोक्ता मंच के आदेश बेअसर हो जाते हैं क्योंकि उन पर अमल नहीं किया जा सकता है. यही नहीं, ऐसी कंपनी के खिलाफ मकान खरीदार कोई नया मामला भी नहीं ला सकते हैं।

याचिका में रियल एस्टेट फर्मों का ‘फारेन्सिक आडिट’ करा कर मकान खरीदारों के योगदान का पता लगाने और उनके द्वारा निवेश किए गए धन की रक्षा करने का भी अनुरोध किया गया है।

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