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पक्षों में समझौता होने पर सेक्शन 482 के तहत हत्या, रेप जैसे गंभीर अपराध की FIR रद्द नहीं की जा सकती : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
5 Oct 2017 9:37 AM GMT
पक्षों में समझौता होने पर सेक्शन 482 के तहत हत्या, रेप जैसे गंभीर अपराध की FIR रद्द नहीं की जा सकती : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]
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सुप्रीम कोर्ट में तीन जजों की बेंच ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता ( CrPC) के सेक्शन 482 के तहत FIR को रद्द की करने की याचिका पर सुनवाई करते वक्त हाईकोर्ट द्वारा ध्यान में रखे जाने वाले सिद्धांत को दोहराया है।

ची़फ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए एम खानवेलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड ने ये फैसला गुजरात हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर दिया है जिसमें CrPC के सेक्शन 482 की याचिका को खारिज कर दिया गया था। अपीलकर्ता FIR को रद्द करने की मांग कर रहे थे कि उनका शिकायतकर्ता के साथ समझौता हो गया है। इस संबंध में शिकायतकर्ता ने हलफनामा भी दाखिल किया। हालांकि हाईकोर्ट ने माना कि ये मामला जबरन वसूली, फर्जीवाडा और साजिश से जुडा है इसलिए समाज के हित में इस समझौते को मंजूर नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने भी सुनवाई के दौरान इस फैसले को बरकरार रखा और निम्न सिद्धांत बनाए।

1. सेक्शन 482 हाईकोर्ट को किसी भी अन्य कोर्ट द्वारा कानून के दुरुपयोग को रोकने के अधिकार देता है या न्याय के अंत को बचाने के का अधिकार देता है। ये प्रावधान कोई नया अधिकार नहीं देता। ये सिर्फ हाईकोर्ट के पास मौजूद अधिकार को मान्यता और बरकरार रखता है।

2. किसी भी FIR या आपराधिक कार्रवाई को पीडित व आरोपी के बीच समझौता होने पर रद्द करने के हाईकोर्ट का अधिकारक्षेत्र किसी अपराध में समझौते के बराबर नहीं है। जब किसी अपराध में समझौते का मामला होता है तो कोर्ट आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 के सेक्शन 320 के तहत कदम उठाता है जबकि 482 के तहत कोर्ट अपने अधिकारक्षेत्र का तभी इस्तेमाल करता है जब अपराध समझौता योग्य ना हो।

3. सेक्शन 482 के तहत किसी भी FIR या शिकायत को रद्द करने की याचिका पर कोई भी धारणा बनाने से पहले ये भी देखे की इस अधिकार का इस्तेमाल न्याय के अंत का औचित्य पूरा करता है।

4. हाईकोर्ट के इस निहित अधिकार का दायरे विस्तृत है और इसके इस्तेमाल को प्रचूरता से करना चाहिए।
( i) न्याय के अंत को सुरक्षित करने के लिए या ( ii) किसी कोर्ट द्वारा कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए

5. किसी भी शिकायत या FIR को पीडित और आरोपी के बीच समझौता होने के आधार पर रद्द करने का फैसला सिर्फ केस के तथ्यों व हालात पर निर्भर करेगा और इस सिद्धांत का संपूर्ण विस्तार नहीं किया जा सकता।

6. सेक्शन 482 के तहत याचिका पर सुनवाई करते वक्त कि विवाद में समझौता हो गया है, हाईकोर्ट को अपराध की प्रकृति और गंभीरता को भी देखना चाहिए। जघन्य और गंभीर अपराधों जैसे हत्या, रेप और डकैती जैसे मामलों को इसलिए रद्द नहीं किया जा सकता कि पीडित या पीडित के घरवालों ने समझौता कर लिया है। साफ तौर पर ये अपराध निजी प्रकृति के नहीं बल्कि समाज पर असर डालते हैं। इन मामलों में ट्रायल को जारी रखने के फैसले में जनहित में गंभीर अपराधों में दोषी लोगों को सजा देना है।

7. इससे अलग संगीन अपराधों से अलग कई आपराधिक मामले सिविल विवाद की तरह होते हैं। ये मामले कोर्ट के रद्द करने के अधिकार के तहत अलग दिशा के हैं।

8. व्यावसायिक, वित्तीय, पार्टनरशिप आदि के आपराधिक केस जिनमें सिविल विवाद का रंग होता है वहां समझौता होने पर रद्द करने के अलग हालात होते हैं।

9. ऐसे मामलों में हाईकोर्ट आपराधिक कार्रवाई को रद्द कर सकता है कि दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया हो, सजा होने की उम्मीद बेहद
कम हो या ये कार्रवाई जारी रहने से उत्पीडन व पक्षपात होता हो या

10. 8 और 9 में दिए गए समीकरण में सिद्धांत में आसाधारण हालात हों। राज्य के वित्तीय और
आर्थिक नुकसान वाले आर्थिक अपराध जो निजी विवाद से अलग हों। किसी आरोपी के आर्थिक अपराध या वित्तीय फर्जीवाडे में शामिल होने पर हाईकोर्ट कार्रवाई को रद्द करने से इंकार कर सकता है। लेकिन इसे बैलेंस करने के लिए उक्त अपराध का वित्तीय या आर्थिक सिस्टम पर असर ही परिणाम को निर्धारित करेगा।


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