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जस्टिस पटेल इस्तीफा : BCI ने दुष्यंत दवे को CJI और कॉलिजियम के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी पर कारण बताओ नोटिस जारी किया [प्रेस विज्ञप्ति पढ़े]

LiveLaw News Network
28 Sep 2017 10:52 AM GMT
जस्टिस पटेल इस्तीफा : BCI ने दुष्यंत दवे को CJI और कॉलिजियम के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी पर कारण बताओ नोटिस जारी किया [प्रेस विज्ञप्ति पढ़े]
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बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया और कॉलिजियम पर अपमानजनक और अंधाधुंध टिप्पणी करने पर वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे को कारण बताओ नोटिस जारी किया है।

BCI की आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक दुष्यंत दवे को चार हफ्ते में जवाब दाखिल करने को कहा गया है और उनका जवाब आने के बाद काउंसिल अगली कार्रवाई करेगी।

इसमें कहा गया है कि काउंसिल के चेयरमैन ने ये सफाई दी है कि वो भले ही जस्टिस पटेल के मामले में कॉलिजियम के फैसले से इत्तेफाक ना रखते हों और इस मामले में गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट एसोसिएशन के साथ कानूनी कार्रवाई में हाथ मिला लें लेकिन कल टीवी पर दुष्यंत दवे ने जो आधारहीन टिप्पणी और बयानबाजी की है वो न्यायपालिका और संस्थान की  छवि को ठेस पहुंचाने वाली हैं। चीफ जस्टिस पर निजी तौर पर हमले के पीछे निजी प्रतिशोध की भावना प्रतीत होती है और ये घोर दुराचारण के समान है।

 ये प्रतिक्रिया कर्नाटक हाईकोर्ट के जज जस्टिस जयंत पटेल के इस्तीफे के बाद आई हैं।

दरअसल जस्टिस पटेल ने वरिष्ठ होने के बावजूद कथित तौर पर किसी भी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के तौर पर नियुक्त ना करने के विरोध में सोमवार को इस्तीफा दे दिया है।  वैसे जस्टिस पटेल की पदोन्नति का मुद्दा पहले भी कई बार उठाया गया लेकिन अंतिम आदेश के तौर पर उनका तबादला इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया गया जहां वरिष्ठता के क्रम में वो तीसरे नंबर पर होते।

इस मामले ने कानून जगत में खलबली मचा दी है। ट्रांसफर की निंदा करते हुए गुजरात एडवोकेटस एसोसिएशन ने इस विरोध में बुधवार को काम ना करने का फैसला किया। एसोसिएशन ने निचली अदालतों व ट्रिब्यूनल में सभी बार एसोसिएशनों को एक दिन काम ना करने की अपील की है। एसोसिएशन ने प्रस्ताव पास किया है कि जज के ट्रांसफर के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाए।

एसोसिएशन ने फैसला लिया है कि सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के कॉलिजियम में नियुक्ति या नियुक्ति ना करने, हाईकोर्ट के जजों को कंफर्म करने या ना करने, हाईकोर्ट के जज को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने या ना बनाने, हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बनाने संबंधी सभी सिफारिशों के खुलासे जैसे बडे मुद्दे उठाए जाएंगे ताकि ऐसे हालात में प्रत्याशी या बार के सामने न्यायिक पुनर्विचार उपलब्ध हो सके।

कॉलिजियम के फैसले पर आधिकारिक बयान जारी करते हुए CJAR ने कहा है कि जिस तरीके से भारत के मुख्य न्यायधीश ने जस्टिस पटेल का तबादला इलाहाबाद हाईकोर्ट किया है, वो दुर्भाग्यपूर्ण है। इस तबादले के पीछे कोई ठोस कारण नहीं दिखता क्योंकि उनका पहले ही एक बार तबादला हो चुका है और अब उन्हें कर्नाटक हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस नियुक्त किया जाना चाहिए था।

CJAR ने आगे जस्टिस पटेल द्वारा विवादित इशरतजहां फर्जी एनकाउंटर की सीबीआई जांच के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि वो राजनीतिक प्रतिष्ठान के खिलाफ केसों को उठाने के लिए अपने  साहस और प्रतिबद्धता के लिए सताए जा रहे हैं।

इस मुद्दे पर सीनियर एडवोकेट दुष्यंत दवे ने लाइव लॉ को भी प्रतिक्रिया दी थी। इस मुद्दे पर दुष्यंत दवे ने कहा कि जस्टिस पटेल अद्भुत प्रतिभा के धनी जज रहे हैं।  साथ ही वो बेहतरीन इंसान भी हैं। वो पूरी तरह ईमानदार और  निडर प्रकृति के व्यक्ति हैं। गरीब लोगों के हक के लिए वो हमेशा खड़े रहे। वो हमेशा नागरिकों के लिए काम करने को आतुर रहे। सरकारी प्रताड़ना के शिकार के लोगों के लिए उन्होंने हमेशा काम किया। जस्टिस पटेल कभी  सरकार के दबाव में नहीं आए। वो खासकर नरेंद्र मोदी की गुजरात सरकार और फिर केंद्र सरकार के दबाव में नहीं आए। वो हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बनने की योग्यता रखते थे। उनमें सुप्रीम कोर्ट के जज की काबलियत भी थी। दवे ने कहा कि उन्हें कार्यपालिका की  ओर से प्रताडित किया गया है और इससे कॉलिजियम की खामियां फिर सामने आ गई हैं कि वो फिलहाल रीढविहीनहै।  जो लोग भी न्यापालिका से प्यार करते हैं उनके लिए ये सदमे का वक्त है। उन्होंने कहा कि  ये मामलाजो कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच का उदाहरण है और वक्त आ गया है कि लोग आखें खोलें ताकि बेहतर भारत बनाया जा सके। दवे ने जस्टिस पटेल को सुप्रीम कोर्ट के जज बनाए जाने की वकालत करते हुए कहा कि वो हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस या फिर सुप्रीम कोर्ट के जज बनने के काबिल हैं।

16 मार्च 2017 को उनका एक आर्टिकल इस संदर्भ में द वायर पर प्रकाशित हुआ था। जस्टिस पटेल 3 दिसंबर 2001 को नियुक्त हुए थे जो कि चार या पांच नियुक्त किए गए नए जजों से सीनियर थे। बिना कारण उन्हें चीफ जस्टिस नहीं बनाया गया जबकि पिछले कॉलिजियम ने कर्नाटक हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस का ट्रांसफर किया था ताकि उन्हें चीफ जस्टिस बनाया जा सके। दुखद ये है कि कॉलिजियम 9 हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस के तौर पर जिन जजों के नामों की सिफारिश की गई थी और वे सभी जस्टिस पटेल से जूनियर थे। ये तमाम जज 2 महीने से लेकर साढ़े चार साल जूनियर थे जिनके नामों की सिफारिश कॉलिजियम ने की थी ऐसा क्यों?


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