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जस्टिस पटेल के इस्तीफे ने मचाई खलबली, कानून जगत से जुडे लोगों ने बताया न्यायपालिका के लिए घातक

LiveLaw News Network
26 Sep 2017 9:46 AM GMT
जस्टिस पटेल के इस्तीफे ने मचाई खलबली, कानून जगत से जुडे लोगों ने बताया न्यायपालिका के लिए घातक
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कर्नाटक हाई कोर्ट के जज जस्टिस जयंत पटेल के इस्तीफे ने कानून जगत में खलबली मचा दी है।  इस बात की चर्चा है कि कहीं ये इस्तीफा किसी चेन की कड़ी तो नहीं। अनुमान लगाया जा रहा है कि जस्टिस पटेल ने इशरत जहां एनकाउंटर केस में सीबीआई जांच का आदेश दिया था, ये उसी का परिणाम हो सकता है। इस मुद्दे पर सीनियर एडवोकेट दुष्यंत दवे समेत कानूनी पेशे से जुडे कई लोगों ने लाइव लॉ को प्रतिक्रिया दी है।

इस मुद्दे पर दुष्यंत दवे ने कहा कि जस्टिस पटेल अद्भुत प्रतिभा के धनी जज रहे हैं।  साथ ही वो बेहतरीन इंसान भी हैं। वो पूरी तरह ईमानदार और  निडर प्रकृति के व्यक्ति हैं। गरीब लोगों के हक के लिए वो हमेशा खड़े रहे। वो हमेशा नागरिकों के लिए काम करने को आतुर रहे। सरकारी प्रताड़ना के शिकार के लोगों के लिए उन्होंने हमेशा काम किया। जस्टिस पटेल कभी  सरकार के दबाव में नहीं आए। वो खासकर गुजरात सरकार और फिर केंद्र सरकार के दबाव में नहीं आए। वो हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बनने की योग्यता रखते थे। उनमें सुप्रीम कोर्ट के जज की काबलियत भी थी।

दवे ने कहा कि उन्हें कार्यपालिका की  ओर से प्रताडित किया गया है और इससे कॉलिजियम की खामियां फिर सामने आ गई हैं कि वो फिलहाल रीढविहीनहै।  जो लोग भी न्यापालिका से प्यार करते हैं उनके लिए ये सदमे का वक्त है। उन्होंने कहा कि  ये मामलाजो कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच का उदाहरण है और वक्त आ गया है कि लोग आखें खोलें ताकि बेहतर भारत बनाया जा सके। दवे ने जस्टिस पटेल को सुप्रीम कोर्ट के जज बनाए जाने की वकालत करते हुए कहा कि वो हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस या फिर सुप्रीम कोर्ट के जज बनने के काबिल हैं। 16 मार्च 2017 को उनका एक आर्टिकल इस संदर्भ में प्रकाशित हुआ था। जस्टिस पटेल 3 दिसंबर 2001 को नियुक्त हुए थे जो कि चार या पांच नियुक्त किए गए नए जजों से सीनियर थे। बिना कारण उन्हें चीफ जस्टिस नहीं बनाया गया जबकि पिछले कॉलिजियम ने कर्नाटक हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस का ट्रांसफर किया था ताकि उन्हें चीफ जस्टिस बनाया जा सके। दुखद ये है कि कॉलिजियम 9 हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस के तौर पर जिन जजों के नामों की सिफारिश की गई थी और वे सभी जस्टिस पटेल से जूनियर थे। ये तमाम जज 2 महीने से लेकर साढ़े चार साल जूनियर थे जिनके नामों की सिफारिश कॉलिजियम ने की थी ऐसा क्यों?

एक अन्य सीनियर एडवोकेट मोहन कतरकी ने भी ऐसे ही  विचार प्रकट किए। उन्होंने कहा कि पद के लालची जज स्वतंत्र न्यायपालिका के  लिए खतरा हैं। साधारणतया जो जज सुप्रीम कोर्ट में भेजे जाते हैं या फिर हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस बनाए जाते हैं वो वरिष्ठता के आधार पर बनाए जाते हैं (कॉलिजियम के आने के बाद ऐसा होता रहा है।) लेकिन जस्टिस पटेल एक अपवाद हैं कि उन्होंने अपने आत्मसम्मान को अपने पेशे से ऊपर रखा और इसके लिए उन्होंने कीमत भी चुकाई जो दुर्भाग्यूपर्ण है। पटेल का हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के तौर पर बनाया जाना खुद ब खुद होना चाहिए था। ये दिखाता है कि किस तरह से न्यायपालिका में राजनीतिक हस्तक्षेप जारी है। जो लोग सत्ता में हैं उनका दबदबा साफ दिखता है। दुर्भाग्यपूर्ण ये है कि कानूनी पेशे में  रहने वाले लोग जस्टिस पटेल के साथ खड़े नहीं हैं और ये चिंता का विषय है। मुंबई लॉबी ने  हमेशा राजनीतिक दखल का मुखर विरोध किया है। लेकिन इस बार दुर्भाग्यूपूर्ण है कि जस्टिस पटेल के मुद्दे को नजरअंदाज कर दिया गया।

वहीं गुजरात हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष असीम पंड्या  ने कहा कि जस्टिस पटेल के साथ हो व्यवहार किया गया है वह निंदनीय है।उन्होंने कहा कि अगर जजों को उनके जजमेंट के लिए सजा दी जाएगी तो लोगों का मौलिक अधिकार कागजों पर ही रह जाएगा।

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