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एसिट अटैकःपीड़ितों को दिया जाए मासिक भुगतान,सरकारी नौकरियों में दिया जाए आरक्षण, उत्तराखंड हाईकोर्ट का आदेश [निणर्य पढें]

LiveLaw News Network
22 Jun 2017 3:28 PM GMT
एसिट अटैकःपीड़ितों को दिया जाए मासिक भुगतान,सरकारी नौकरियों में दिया जाए आरक्षण, उत्तराखंड हाईकोर्ट का आदेश [निणर्य पढें]
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उत्तराखंड हाई कोर्ट ने एक एतिहासिक फैसले में कहा है कि एसिड अटैक पीड़ितों को सरकारी नौकरियों में रिजर्वेशन दिया जाए साथ ही मासिक मुआवजे का भुगतान किया जाए।


उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सोमवार को एसिड अटैक की पीड़िताओं के पुर्नवास व इस तरह की घटनाओं से बचाव करने के संबंध में कई निर्देश जारी किए है। इन निर्देश में थर्ड या फोर्थ डिग्री बर्न इंजूरी की पीड़िताओं को मासिक भुगतान,अतिरिक्त व एकमुश्त भुगतान और सरकारी नौकरियों में अपाहिजों के लिए आरक्षित कैटेगरी में आरक्षण देने की बात कही है। इसके अलावा उत्तराखंड में स्थित सभी लोअर कोर्ट को निर्देश दिया गया है कि तीन महीने के अंदर इस तरह के मामलों में दिन-प्रतिदिन सुनवाई करके केसों का निपटारा करें।


हाईकोर्ट इस मामले में राज्य सरकार की तरफ से दायर एक अपील पर सुनवाई कर रही थी। राज्य सरकार ने वर्ष 2010 में रूड़की,जिला हरिद्वार की एक सेशन कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले को चुनौती दी थी। इस फैसले के तहत सेशन कोर्ट ने एक आरोपी को बरी कर दिया था,जिस पर आरोप था कि उसने बीस साल की एक पोस्ट ग्रेजुएट छात्रा पर तेजाब फेंक दिया था।


हाईकोर्ट ने सेशन कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए कहा कि निचली अदालत ने इस मामले में अति तकनीक विचार अपनाया है। हाईकोर्ट ने आरोपी को इस मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 307 के तहत दोषी करार दिया। कोर्ट ने कई पुराने आदेशों को दोहराते हुए कहा कि निजी व सरकारी,दोनों तरह के अस्पताल किसी एटिक अटैक पीड़ित को तुरंत चिकित्सीय सहायता देने के लिए जिम्मेदार है।


न्यायमूर्ति एस के शर्मा व न्यायमूर्ति राजीव शर्मा की खंडपीठ ने कहा कि किसी पर एसिड से अटैक करने से शारीरिक,मानसिक व मनोवैज्ञानिक प्रताड़ना होती है। हर नागरिक को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि एसिड अटैक पीड़ित के साथ जो होता है,वह उनके परिवार के किसी सदस्य के साथ भी हो सकता है। हर इंसान को जीने का अधिकार है,जिसमें किसी भी तरह की मानसिक,शारीरिक व मनोवैज्ञानिक प्रताड़ना से मुक्त होकर जीना भी शामिल है,चाहे वह पीछा करने के कारण हो या यौन शोषण के कारण या फिर जलने के कारण। एसिड के कारण जलने से पीड़ित को चोट या घाव तो मिलता ही है,यह उसे कलंकित भी कर देता है। खंडपीठ ने इस मामले में अनिवार्य निर्देश जारी किए है ताकि एसिड अटैक के हमलों को दबाया जा सके। जो इस प्रकार है।


(1) राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह चार सप्ताह के अंदर एसिड अटैक पीड़ितों के लिए एक क्रिमिनल इंजरी कंपनसेशन बोर्ड का गठन करे। सुप्रीम कोर्ट इसके लिए (2016)3एससीसी 669,लक्ष्मी बनाम यूनियन आॅफ इंडिया व अन्य के मामले में पहले ही आदेश दे चुकी है।


(2) उत्तराखंड राज्य में स्थित सभी निजी अस्पतालों को निर्देश दिया जाता है कि वह सुप्रीम कोर्ट के (2016)3एससीसी 669,लक्ष्मी बनाम यूनियन आॅफ इंडिया व अन्य के तहत दिए गए फैसले के तहत सभी एसिड अटैक पीड़िताओं को तुरंत चिकित्सीय सहायता उपलब्ध कराएंगे।


(3) पूरे उत्तराखंड राज्य में किसी व्यक्ति को एसिड नहीं बेचा जाएगा। सिर्फ कोई लाइसेंस धारक डीलर ही दूसरे डीलर को एसिड बेच पाएगा या फिर लाइसेंस धारक डीलर ही किसी स्कूल,कालेज,रिसर्च या मेडिकल संस्थान या अस्पताल या डिस्पेंसरी या किसी मान्यता प्राप्त सरकारी संस्थान या किसी औद्योगिक फर्म को एसिड बेच सकता है। अगर कोई गैर कानूनी तरीके से एसिड बेचता हुआ पाया जाए,तो उसके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर ली जाए।


(4) इस समय मौजूद कानून असहाय महिलाओं पर एसिड अटैक के हमले होेने से नहीं रोक पा रहे है,इसलिए पूरे राज्य के एसएसपी यानि सीनियर सुपरइंटेंडेंट आॅफ पुलिस को निर्देश दिया जाता है कि वह भारतीय दंड संहिता की धारा 326ए,326बी,354ए,354बी,354सी, व 354डी के तहत तुरंत प्राथमिकी दर्ज करे,ऐसे मामलोें में केस दर्ज करने में देरी न की जाए। ऐसे मामलों में गैजटेड अधिकारी के निरीक्षण में सात दिन के अंदर जांच पूरी की जाए। जिसके बाद सात दिन के अंदर संबंधित आपराधिक कोर्ट के समक्ष चालान पेश किया जाए। अगर जांच में कोई लापरवाही पाई जाएगी तो इसके लिए गैजेटेड अधिकारी को व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार माना जाएगा।


(5) यौन शोषण,किसी का पीछा करना व एसिड अटैक जैसे मामलों को फास्ट ट्रैक करने की जरूरत है। इसलिए उत्तराखंड की सभी निचली अदालतों कोे निर्देश दिया जाता है कि वह भारतीय दंड संहिता की धारा  326ए,326बी,354ए,354बी,354सी, व 354डी के तहत दर्ज मामलों की सुनवाई दिन-प्रतिदिन की जाए और तीन महीने के अंदर ऐसे मामलों की सुनवाई पूरी कर ली जाए। अगर किसी मामले में तीन माह के अंदर सुनवाई पूरी नहीं होती है,तो ऐसा न होने के कारण रिकार्ड में दर्ज किए जाए। वहीं एसिड अटैक  के मामलों में कोर्ट संवेदनशीलता दर्शाए।


(6) राज्य सरकार को निर्देश दिया जाता है कि वह वह भारतीय दंड संहिता की धारा 326ए,326बी,354ए,354बी,354सी, व 354डी के तहत दर्ज मामलों के चश्मदीद गवाहों को सुनवाई के दौरान व केस खत्म होने तक सुरक्षा उपलब्ध कराए।


(7) राज्य सरकार को यह भी निर्देश दिया जाता है कि वह एसिड अटैक की पीड़िताओं को सरकारी नौकरी देने के लिए अपाहिजों के लिए बनाई गई कैटेगरी में शामिल करे। वहीं इन पीड़िताओं के पुर्नवास के लिए अलग से योजना बनाई जाए।


(8) राज्य सरकार तीन महीने के अंदर यह सुनिश्चित करे कि सभी जिला अस्पतालों व संयुक्त अस्पतालों में एक विशेष वार्ड का प्रबंध किया जाए जो इस तरह की बर्न इंजरी की पीड़िताओं को दिया जा सके ताकि कोई इंफेक्शन न फैले।


(9) वहीं राज्य सरकार को निर्देश दिया जाता है कि वह एसिड अटैक की पीड़िताओं के पूरी तरह ठीक होने तक उनको मुफत इलाज उपलब्ध कराए।


 (10)राज्य सरकार को यह भी निर्देश दिया जाता है कि वह प्राथमिकी दर्ज होने के तुरंत बाद एसिड अटैक की पीड़िताओं को एकमुश्त सहायता राशि के तौर पर एक-एक लाख रूपए दे। वही थर्ड या फोर्थ डिग्री बर्न इंजूरी की पीड़िताओं को प्रतिमाह सात हजार रूपए भी दिए जाए। वहीं फर्स्ट व सैकंड डिग्री बर्न इंजूरी की पीड़िताओं को प्रतिमाह पांच हजार रूपए दिए जाए। इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार पीड़िताएं तीन लाख रूपए मुआवजा भी पाने की हकदार है।



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