मुस्लिम मां भी नाबालिग की संपत्ति की संरक्षक नियुक्त हो सकती है, बच्चे के हित में हिस्सा बेचने की अनुमति दी जा सकती है: उड़ीसा हाईकोर्ट

  • मुस्लिम मां भी नाबालिग की संपत्ति की संरक्षक नियुक्त हो सकती है, बच्चे के हित में हिस्सा बेचने की अनुमति दी जा सकती है: उड़ीसा हाईकोर्ट

    उड़ीसा हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा है कि मुस्लिम कानून के तहत मां को केवल अपने रिश्ते के आधार पर नाबालिग की संपत्ति का कानूनी संरक्षक होने का अधिकार नहीं मिलता। हालांकि, यदि नाबालिग के कल्याण और उसके स्पष्ट हित में ऐसा करना आवश्यक हो, तो सक्षम अदालत संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 के तहत मां को नाबालिग की संपत्ति का संरक्षक नियुक्त कर सकती है और संपत्ति में उसके हिस्से को बेचने की अनुमति भी दे सकती है।

    जस्टिस संजय कुमार मिश्रा की पीठ ने नाबालिग की संपत्ति के हस्तांतरण से संबंधित 1890 के अधिनियम के प्रावधानों की व्याख्या करते हुए कहा कि अधिनियम की धारा 31 के तहत मुख्य कसौटी यह है कि क्या संपत्ति की बिक्री नाबालिग के लिए आवश्यक है या उससे उसे स्पष्ट लाभ मिलेगा।

    अदालत ने कहा,

    “इसलिए जांच का विषय यह नहीं है कि व्यक्तिगत कानून के तहत मां कानूनी संरक्षक है या नहीं, बल्कि यह है कि उसे संरक्षक नियुक्त करने के बाद अदालत के समक्ष उपलब्ध सामग्री के आधार पर क्या यह संतुष्टि होती है कि नाबालिग के कल्याण और उसके स्पष्ट हित में नियंत्रित तरीके से संपत्ति बेचना उचित है।”

    मामले में पहली अपीलकर्ता नाबालिग दूसरी अपीलकर्ता की मां है। उसके पति ने भुवनेश्वर में एक अचल संपत्ति खरीदी थी और वर्ष 2021 में उनकी मृत्यु हो गई। पति की मृत्यु के बाद मां अपनी दो बेटियों के साथ बेरहामपुर में रह रही है। इनमें नाबालिग बेटी दूसरी अपीलकर्ता है, जबकि दूसरी बेटी मामले में प्रतिवादी है।

    नाबालिग के पिता जीवित रहते हुए उसकी पढ़ाई और भरण-पोषण का खर्च उठाते थे। उनकी मृत्यु के बाद मां, जो पर्दानशीं महिला है, उसके पास नाबालिग की शिक्षा, पोषण, भोजन और आवास की उचित व्यवस्था करने के लिए स्वतंत्र और पर्याप्त आय नहीं है। इसी कारण उसने नाबालिग के कल्याण और आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए संपत्ति में उसके हिस्से को बेचने की अनुमति मांगी।

    अधिनियम की धारा 29 के तहत नाबालिग की अचल संपत्ति को न्यायिक नियंत्रण में रखा गया और अदालत की पूर्व अनुमति के बिना उसके हस्तांतरण पर रोक है। वहीं, धारा 31 अदालत को आवश्यकता होने या नाबालिग को स्पष्ट लाभ मिलने की स्थिति में संपत्ति बेचने की अनुमति देने का अधिकार देती है। हालांकि, गंजाम के जिला जज ने मां की अर्जी खारिज कर दी थी, जिसके बाद हाईकोर्ट में अपील दायर की गई।

    हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या मुस्लिम मां को नाबालिग की संपत्ति का संरक्षक नियुक्त किया जा सकता है और क्या उसे संपत्ति बेचने की अनुमति दी जा सकती है। यदि ऐसा संभव है, तो अनुमति देने के लिए किन बातों पर विचार किया जाना चाहिए।

    अदालत ने मुल्ला के मोहम्मडन कानून के सिद्धांतों की धारा 360 का उल्लेख किया। इसके अनुसार, धारा 359 में बताए गए कानूनी संरक्षक उपलब्ध न होने पर अदालत नाबालिग की संपत्ति की सुरक्षा और संरक्षण के लिए संरक्षक नियुक्त कर सकती है। इसके अलावा, 1890 के अधिनियम की धारा 7 सक्षम अदालत को नाबालिग के कल्याण के लिए उसकी संपत्ति का संरक्षक नियुक्त करने का अधिकार देती है।

    अदालत ने कहा कि अधिनियम की धारा 17 के तहत संरक्षक नियुक्त करते समय नाबालिग का कल्याण सर्वोपरि होना चाहिए। इसके लिए प्रस्तावित संरक्षक के चरित्र, क्षमता, नाबालिग से रिश्ते की निकटता तथा नाबालिग और उसकी संपत्ति के साथ मौजूदा संबंधों पर भी विचार किया जाना चाहिए।

    जस्टिस मिश्रा ने गौर किया कि इस मामले में नाबालिग के पिता की मृत्यु हो चुकी है। यह भी नहीं दिखाया गया कि पिता की वसीयत के तहत कोई निष्पादक या नाबालिग के संपत्ति-संबंधी कानूनी संरक्षक के रूप में कोई दादा मौजूद है। मां ही वह व्यक्ति है जिसकी देखरेख और अभिरक्षा में नाबालिग रह रही है। पिता की मृत्यु के बाद से मां उसकी परवरिश और शिक्षा का जिम्मा भी संभाल रही है।

    इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही मुस्लिम कानून के तहत मां केवल अपने दर्जे के कारण नाबालिग की संपत्ति की कानूनी संरक्षक नहीं बन जाती, लेकिन उसे सक्षम अदालत द्वारा संरक्षक नियुक्त किए जाने से अयोग्य नहीं माना जा सकता, बशर्ते कानून में निर्धारित कल्याण संबंधी शर्तें पूरी होती हों।

    इसके बाद अदालत ने विचार किया कि नाबालिग के हिस्से को बेचने की मां की मांग उसके कल्याण और स्पष्ट लाभ के अनुरूप है या नहीं। तथ्यों का विश्लेषण करते हुए पीठ ने कहा कि इस मामले में संपत्ति बेचने की मांग केवल उसे नकदी में बदलने की इच्छा तक सीमित नहीं है। नाबालिग के पिता, जो परिवार के कमाने वाले सदस्य बताए गए, अब जीवित नहीं हैं। मां के पास स्वतंत्र और पर्याप्त आय नहीं है, नाबालिग स्कूल जाने की उम्र में है और संपत्ति परिवार के निवास स्थान से काफी दूर है। मां ने बिक्री से मिलने वाली रकम का इस्तेमाल नाबालिग की शिक्षा, भरण-पोषण और उसके लिए दूसरी संपत्ति खरीदने या निवेश करने में करने का प्रस्ताव दिया। बड़ी बेटी भी इस आवेदन का समर्थन करती है और इसके विरोध में कोई साक्ष्य सामने नहीं आया।

    हाईकोर्ट ने माना कि इन सभी परिस्थितियों को अधिनियम की धारा 31 के तहत उपलब्ध संरक्षण के साथ देखने पर संपत्ति बेचने की आवश्यकता और कम से कम नाबालिग को स्पष्ट लाभ होने का मामला बनता है।

    इसी आधार पर अदालत ने मोहम्मडन कानून के प्रासंगिक प्रावधानों के अनुसार नाबालिग का संपत्ति में हिस्सा निर्धारित किया और उसके हित में नियंत्रित तरीके से संपत्ति बेचने की अनुमति दे दी। हालांकि, 1890 के अधिनियम की धारा 31(2) और 31(3) के तहत सुरक्षा उपाय और शर्तें भी लगाई गईं। इनमें बिक्री से प्राप्त पूरी शुद्ध रकम को सावधि जमा यानी फिक्स्ड डिपॉजिट में जमा करना भी शामिल है। अदालत ने स्पष्ट किया कि नाबालिग के हिस्से की बिक्री के दौरान इन शर्तों का सख्ती से पालन करना होगा।

    अंत में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने मां को मुस्लिम कानून के तहत नाबालिग की संपत्ति का प्राकृतिक या कानूनी संरक्षक नहीं माना है। मां को संपत्ति का प्रबंधन करने और उसे बेचने का अधिकार सक्षम अदालत द्वारा संरक्षक नियुक्त किए जाने तथा 1890 के अधिनियम के तहत शर्तों के साथ दी गई अनुमति से प्राप्त होता है।


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