वकील को केवल मुवक्किल के निर्देश पर कानूनी नोटिस भेजने के लिए उसके कृत्यों के संबंध में अभियोजित नहीं किया जा सकता: उड़ीसा हाईकोर्ट
Amir Ahmad
4 Sept 2026 3:36 PM IST

उड़ीसा हाईकोर्ट ने कहा कि किसी पक्ष को मुवक्किल के निर्देश पर कानूनी नोटिस भेजने मात्र से किसी वकील के खिलाफ आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, जब तक वह किसी आपराधिक साजिश का हिस्सा न हो।
कानूनी पेशेवरों को पेशेवर दायित्वों के निर्वहन के दौरान किए गए कार्यों के लिए प्राप्त संरक्षण पर जोर देते हुए जस्टिस डॉ. संजीब कुमार पाणिग्रही की पीठ ने कहा,
“यदि हर असफल कानूनी राय या मुवक्किल द्वारा किए गए प्रत्येक तथ्यात्मक प्रतिवेदन को बाद में वकील के खिलाफ आपराधिक मुकदमे की नींव बना दिया जाए, तो बार न्याय-प्रदान प्रणाली के एक स्वतंत्र घटक के रूप में काम करना बंद कर देगा। BCI के नियम स्वयं यह मान्यता देते हैं कि वकील का कर्तव्य है कि वह आरोपी का बचाव करे, भले ही आरोपी के दोष के संबंध में वकील की व्यक्तिगत राय कुछ भी हो।”
याचिकाकर्ता बिजयानंद पांडा पेशे से वकील हैं। उन्होंने परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 138 के तहत दंडनीय चेक अनादरण के संबंध में अपने आधिकारिक लेटरहेड पर कानूनी नोटिस तैयार किया और उसे शिकायतकर्ता के पते पर भेजा। उन्होंने कथित तौर पर यह नोटिस अपने वरिष्ठ की सलाह पर और उनके एक मुवक्किल की ओर से भेजा था।
नोटिस प्राप्त होने के बाद शिकायतकर्ता ने IPC की धाराओं 420, 265, 406 और 120बी, उड़ीसा मनी लेंडर्स एक्ट, 1939 की धारा 19 तथा धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 की धारा 4 के तहत FIR दर्ज कराई। इसमें याचिकाकर्ता, उनके वरिष्ठ और दो अन्य व्यक्तियों को आरोपी बनाया गया। शिकायतकर्ता का आरोप था कि याचिकाकर्ता के वरिष्ठ के उक्त मुवक्किल ने उसे धन उधार दिया और कुछ हस्ताक्षरित खाली चेक अपने पास रख लिए थे। कर्ज चुकाने के बावजूद उसने खाली चेक वापस नहीं किए और अवैध लाभ के लिए दबाव बनाया।
याचिकाकर्ता ने पहले गिरफ्तारी-पूर्व जमानत की मांग की, जिसे हाईकोर्ट ने 2018 में मंजूर कर लिया था। इसके बाद याचिकाकर्ता समेत सभी आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया गया।
आपराधिक कार्यवाही से राहत की मांग करते हुए याचिकाकर्ता ने लंबित कार्यवाही रद्द करने के लिए CrPC की धारा 482 के तहत याचिका दायर की।
विचार के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न यह था कि क्या कोई वकील, जो अपने वरिष्ठ के निर्देश पर और किसी नामित मुवक्किल की ओर से सख्ती से कानूनी नोटिस जारी करता है, उसे सह-साजिशकर्ता के रूप में आरोपी बनाया जा सकता है, खासकर तब जब उसके पास कथित मूल गलत कृत्य की जानकारी या उसमें सक्रिय भागीदारी दर्शाने वाली कोई स्वतंत्र सामग्री न हो।
शुरुआत में ही जस्टिस पाणिग्रही ने स्पष्ट किया कि अपने मुवक्किल के निर्देश पर पेशेवर दायित्व निभाते हुए मसौदा तैयार करने या पत्राचार करने, जिसमें NI Act की धारा 138 के तहत नोटिस भेजना भी शामिल है, से वकील उसमें किए गए दावों की सत्यता का गारंटर नहीं बन जाता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि वकील को आपराधिक अभियोजन से पूर्ण संरक्षण प्राप्त नहीं है। हालांकि, कसौटी यह है कि क्या प्रथमदृष्टया ऐसी कोई सामग्री मौजूद है, जिससे यह संकेत मिले कि वकील को मुवक्किल के निर्देशों के पीछे छिपी अवैधता की जानकारी थी या वह कथित साजिश में जानबूझकर और स्वेच्छा से शामिल था।
इस कसौटी पर विचार करते हुए अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ नहीं है, जिससे यह पता चले कि याचिकाकर्ता को खाली चेकों के दुरुपयोग के जरिए धन ऐंठने की कथित योजना की जानकारी थी, या उन्होंने इससे संबंधित किसी बैठक, बातचीत या लेन-देन में भाग लिया।
अदालत ने कहा,
“ऐसी कोई जोड़ने वाली सामग्री न होने पर केवल इसलिए किसी वकील के खिलाफ आपराधिक कानून की प्रक्रिया को आगे बढ़ने देना कि उसने सद्भावना से पेशेवर सहायता प्रदान की, पेशेवर संबंध को आपराधिक संलिप्तता, लापरवाही को आपराधिक मंशा और पेशेवर निर्णय की त्रुटि को आपराधिक साजिश में भागीदारी समझने जैसा होगा। आपराधिक कानून, जो दोषपूर्ण आचरण के लिए दंडात्मक परिणाम निर्धारित करता है, को ऐसे कमजोर और अनिश्चित आधार पर लागू नहीं होने दिया जा सकता।”
नतीजतन, हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ लंबित आपराधिक कार्यवाही रद्द की, जबकि अन्य आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही जारी रखने की अनुमति दी।


