अवैध हिरासत न हो तो बाल अभिरक्षा विवाद रिट अदालत में नहीं सुलझाए जाने चाहिए: उड़ीसा हाइकोर्ट

Amir Ahmad

25 Feb 2026 3:38 PM IST

  • अवैध हिरासत न हो तो बाल अभिरक्षा विवाद रिट अदालत में नहीं सुलझाए जाने चाहिए: उड़ीसा हाइकोर्ट

    उड़ीसा हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि बाल अभिरक्षा से जुड़े विवादों का निपटारा रिट अदालतें बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के माध्यम से नहीं करेंगी, जब तक यह स्पष्ट न हो जाए कि बच्चे को अवैध या गैरकानूनी रूप से रोका गया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि अभिरक्षा का प्रश्न जटिल तथ्यों से जुड़ा हो और विस्तृत साक्ष्य की आवश्यकता हो तो पक्षकारों को सक्षम सिविल अदालत के पास भेजा जाना चाहिए।

    चीफ जस्टिस हरीश टंडन और जस्टिस मुराहारी श्री रमन की खंडपीठ ने कहा,

    “जैसे ही यह प्रतीत होता है कि अभिरक्षा अवैध नहीं है और मुख्य प्रश्न यह है कि बच्चे के हित में उसे वर्तमान देखरेख से हटाकर किसी अन्य को सौंपना उचित होगा या नहीं तब पक्षकारों को सिविल अदालत जाने के लिए कहना ही उचित है।”

    मामले में याचिकाकर्ता की पत्नी का असामयिक निधन हो गया। उनके पीछे पांच वर्ष का एक नाबालिग बच्चा है। याचिकाकर्ता के अनुसार उसने बच्चे की देखभाल के लिए उसके मामा-मामी से चेन्नई में रहने का अनुरोध किया किंतु वे बच्चे को ओडिशा ले आए और उसके अनुरोध के बावजूद उसे वापस नहीं किया।

    याचिकाकर्ता ने बाल कल्याण समिति, बालासोर का दरवाजा खटखटाया, जिसने बच्चे को प्रस्तुत करने का आदेश दिया। इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई जहां हस्तक्षेप से इनकार करते हुए समिति को अभिरक्षा पर अंतिम आदेश पारित करने से रोका गया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाइकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर बच्चे की अभिरक्षा मांगी।

    याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि वह हिंदू अल्पसंख्यकता और अभिभावकता अधिनियम, 1956 की धारा 6 के तहत प्राकृतिक अभिभावक है और उसे ही बच्चे की अभिरक्षा मिलनी चाहिए। दूसरी ओर निजी प्रतिवादियों ने कहा कि बच्चा सक्षम प्राधिकारी के आदेश के तहत उनके पास है, इसलिए हाइकोर्ट को इस विवाद में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

    हाइकोर्ट ने 'तेजस्विनी गौड़ बनाम शेखर जगदीश प्रसाद तिवारी' (2019), 'गौतम कुमार दास बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली' (2024) तथा 'विवेक कुमार चतुर्वेदी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' (2025) सहित कई निर्णयों का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के माध्यम से अभिरक्षा तभी दी जा सकती है, जब यह पाया जाए कि बच्चा कानून से परे या अवैध रूप से रखा गया।

    खंडपीठ ने कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की स्वीकार्यता किसी निश्चित सूत्र में नहीं बांधी जा सकती और प्रत्येक मामले के तथ्यों पर निर्भर करती है। सबसे महत्वपूर्ण विचार बच्चे का कल्याण है। यदि मामला जटिल हो तो रिट अदालत को सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण नहीं करना चाहिए और पक्षकारों को हिंदू अल्पसंख्यकता और अभिभावकता अधिनियम, 1956 या अभिभावक एवं वार्ड अधिनियम, 1890 के तहत सक्षम अदालत में जाने के लिए कहना चाहिए।

    वर्तमान मामले में अदालत ने पाया कि बच्चा बाल कल्याण समिति के आदेश के तहत निजी प्रतिवादियों के पास है, इसलिए इसे अवैध अभिरक्षा नहीं कहा जा सकता। इस आधार पर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया गया।

    अदालत ने अपने पूर्व निर्णय 'कौशल्या दास बनाम ओडिशा राज्य' (2022) का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया कि रिट अदालत में अधिकारों का निर्धारण केवल शपथपत्रों के आधार पर होता है और जहां विस्तृत जांच आवश्यक हो, वहां असाधारण अधिकार क्षेत्र का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। केवल अपवादात्मक परिस्थितियों में ही बंदी प्रत्यक्षीकरण के माध्यम से नाबालिग की अभिरक्षा का निर्णय किया जा सकता है।

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