बैंक अकाउंट में जमा धन खाताधारक की संपत्ति, बिना कानूनी आदेश अनिश्चितकाल तक खाता फ्रीज नहीं किया जा सकता: तेलंगाना हाईकोर्ट

Amir Ahmad

16 Jun 2026 6:42 PM IST

  • बैंक अकाउंट में जमा धन खाताधारक की संपत्ति, बिना कानूनी आदेश अनिश्चितकाल तक खाता फ्रीज नहीं किया जा सकता: तेलंगाना हाईकोर्ट

    तेलंगाना हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी नागरिक का बैंक अकाउंट केवल आंतरिक पत्राचार, पोर्टल अलर्ट या अनौपचारिक इलेक्ट्रॉनिक संदेशों के आधार पर अनिश्चितकाल तक फ्रीज नहीं किया जा सकता, जब तक कि ऐसी कार्रवाई किसी वैधानिक अधिकार के तहत न की गई हो।

    जस्टिस नागेश भीमपाका की एकल पीठ ने कहा कि बैंक अकाउंट में जमा धन खाताधारक की संपत्ति है और खाते के संचालन पर रोक लगाना व्यक्ति के आजीविका के अधिकार, संपत्ति के अधिकार तथा उसके वैध धन तक पहुंच को प्रभावित करता है।

    अदालत ने कहा,

    “बैंक अकाउंट में मौजूद धन खाताधारक की संपत्ति है। ऐसे अकाउंट के संचालन पर प्रतिबंध लगाने के लिए कानून का स्पष्ट आधार, उचित प्रक्रिया और आवश्यक कानूनी सुरक्षा उपायों का पालन होना चाहिए।”

    मामला कनकटी नरेश द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि उसका बचत खाता साइबर अपराध संबंधी शिकायतों के आधार पर फ्रीज कर दिया गया, जबकि उसे कोई नोटिस, आदेश या कारण नहीं बताया गया।

    याचिकाकर्ता ने बताया कि उसने कपास और धान की खेती की थी तथा कपास बेचने पर उसे 1.50 लाख रुपये से अधिक की राशि मिली थी, जो उसके खाते में जमा हुई। लेकिन जब वह राशि निकालने पहुंचा तो उसे बताया गया कि साइबर अपराध शाखा के निर्देश पर खाता फ्रीज कर दिया गया।

    बैंक की ओर से कहा गया कि राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर प्राप्त शिकायतों और विभिन्न राज्यों की कानून प्रवर्तन एजेंसियों से मिले संदेशों के आधार पर अकाउंट पर डेबिट फ्रीज लगाया गया।

    बैंक ने दावा किया कि उसने ग्राहकों के हितों की रक्षा और संभावित धोखाधड़ी रोकने के लिए सद्भावना में यह कदम उठाया।

    हालांकि अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड पर किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी खाता फ्रीज करने, जब्त करने या प्रतिबंध लगाने का कोई औपचारिक आदेश प्रस्तुत नहीं किया गया।

    अदालत ने यह भी कहा कि आपात स्थिति में भले ही पूर्व सूचना न दी जाए, लेकिन बाद में कारण बताना और आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराना जरूरी है।

    हाईकोर्ट ने कहा कि केवल शिकायतों का अस्तित्व किसी व्यक्ति को उसके पूरे बैंक बैलेंस से वंचित रखने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता। संबंधित प्राधिकारियों को यह भी देखना चाहिए कि अकाउंट में जमा राशि का स्रोत क्या है और क्या वह वैध आय से प्राप्त हुई है।

    अदालत ने कहा कि साइबर धोखाधड़ी गंभीर समस्या है और वित्तीय संस्थानों को जांच एजेंसियों का सहयोग करना चाहिए, लेकिन धोखाधड़ी-रोधी उपाय भी कानून और निष्पक्षता की सीमाओं के भीतर ही होने चाहिए।

    अंततः अदालत ने अकाउंट पर जारी डेबिट फ्रीज को मनमाना और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत बताते हुए रद्द कर दिया।

    हाईकोर्ट ने संबंधित बैंक को दो सप्ताह के भीतर अकाउंट डी-फ्रीज कर सामान्य लेन-देन की अनुमति देने का निर्देश दिया।

    हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में कोई सक्षम जांच एजेंसी कानून के अनुसार नया आदेश जारी करती है, तो बैंक उस पर कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होगा। साथ ही अदालत ने कहा कि उसने साइबर शिकायतों या उनसे जुड़ी जांच के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की।

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