'प्रदर्शन में चेहरे की पहचान' तकनीक केवल आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों की पहचान करती है: दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में कहा
Amir Ahmad
18 Aug 2026 5:17 PM IST

परीक्षा प्रश्नपत्र लीक के विरोध में हुए छात्र प्रदर्शनों के दौरान चेहरे की पहचान करने वाली तकनीक के इस्तेमाल को लेकर दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि इस तकनीक के जरिए केवल ऐसे लोगों की तस्वीरें पहचानी गईं, जिनका आपराधिक रिकॉर्ड है या जो पहले से पुलिस के आपराधिक आंकड़ों में दर्ज हैं। पुलिस ने इसे परिस्थिति के अनुरूप और संतुलित पुलिसिंग उपाय बताया।
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में दिल्ली पुलिस ने कहा कि चेहरे की पहचान करने वाला सॉफ्टवेयर प्रदर्शन स्थल पर मौजूद हर व्यक्ति की तस्वीर या व्यक्तिगत जानकारी अपने आप दर्ज नहीं करता। पुलिस के अनुसार शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की अंधाधुंध निगरानी या उनकी निजी जानकारी जुटाने के लिए इसका इस्तेमाल नहीं किया गया।
पुलिस ने कहा कि इस तकनीक के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ सीधे कोई कार्रवाई नहीं की जाती। पहले मौके पर अलग से जांच की जाती है कि जिस व्यक्ति की पहचान हुई, वह वास्तव में प्रदर्शन स्थल पर मौजूद था या नहीं। पुलिस के मुताबिक, तकनीक का इस्तेमाल गंभीर अपराधों में पहले से आपराधिक रिकॉर्ड रखने वाले लोगों की पहचान के लिए किया जाता है, जबकि यातायात चालान जैसे मामूली मामलों को इसके दायरे में नहीं रखा जाता।
मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने की। केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पुलिस के हलफनामे में कही गई बातों को दोहराते हुए कहा कि तकनीक के जरिए उन्हीं लोगों के चेहरे पहचाने जाते हैं, जिनके नाम अपराध संबंधी आंकड़ों में दर्ज हैं।
हालांकि, सीनियर एडवोकेट एन. हरिहरन और मेनका गुरुस्वामी ने पुलिस के दावे का विरोध किया। उन्होंने कहा कि चेहरे की पहचान तकनीक इस तरह काम नहीं करती, जैसा पुलिस बता रही है। मेनका गुरुस्वामी ने विशेष रूप से आरोप लगाया कि पुलिस ने चेहरे की पहचान के जरिए जुटाए गए आंकड़ों को संसाधित करने के लिए एक निजी कंपनी की सेवाएं भी ली थीं।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन स्थलों पर निगरानी उपकरणों के इस्तेमाल को चुनौती देने वाली एक अन्य याचिका पर भी नोटिस जारी किया।
सुनवाई के दौरान पीठ ने छात्र प्रदर्शनों से जुड़े सभी मुद्दों को सुप्रीम कोर्ट के किसी पूर्व जस्टिस की अध्यक्षता वाली उच्चाधिकार प्राप्त समिति के पास भेजने का सुझाव दिया। हालांकि, याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने चेहरे की पहचान तकनीक से जुड़े मुद्दे को समिति के पास भेजे जाने का विरोध किया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि चेहरे की पहचान तकनीक का मामला निजता और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा है। ऐसे महत्वपूर्ण संवैधानिक सवालों का फैसला किसी समिति पर नहीं छोड़ा जा सकता।
इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने भरोसा दिलाया कि संवैधानिक मुद्दों पर फैसला सुप्रीम कोर्ट खुद करेगा।


