अदालतें 24 घंटे का मनोरंजन चैनल नहीं हैं: सुप्रीम कोर्ट ने लाइव स्ट्रीमिंग पर जताई चिंता, हाईकोर्टों से मांगी रिपोर्ट

Amir Ahmad

24 July 2026 5:24 PM IST

  • अदालतें 24 घंटे का मनोरंजन चैनल नहीं हैं: सुप्रीम कोर्ट ने लाइव स्ट्रीमिंग पर जताई चिंता, हाईकोर्टों से मांगी रिपोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने अदालत की कार्यवाही की लगातार लाइव स्ट्रीमिंग पर पुनर्विचार की जरूरत जताते हुए कहा कि अदालतें 24 घंटे का मनोरंजन चैनल नहीं बन सकतीं।

    साथ ही अदालत ने बिना अनुमति न्यायिक कार्यवाही के वीडियो और ऑडियो क्लिप सोशल मीडिया पर साझा करने पर अंतरिम रोक लगाई।

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सभी हाईकोर्टों से यह भी रिपोर्ट मांगी कि उन्होंने अदालत की कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग संबंधी सुप्रीम कोर्ट के मॉडल नियमों को किस हद तक लागू किया और लगातार लाइव स्ट्रीमिंग का क्या प्रभाव पड़ा है।

    सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में स्पष्ट किया कि अदालत की कार्यवाही की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को बिना संबंधित हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल या सुप्रीम कोर्ट के महासचिव की अनुमति के निकालना, संपादित करना, प्रसारित करना, दोबारा शेयर करना, अपलोड करना, उससे कमाई करना, संग्रहित करना या किसी मंच पर उपलब्ध कराना प्रतिबंधित रहेगा।

    सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि लाइव स्ट्रीमिंग केवल सार्वजनिक महत्व के मामलों में या उन मामलों में होनी चाहिए, जहां अदालत विशेष अनुमति दे या दोनों पक्ष इसकी संयुक्त मांग करें।

    उन्होंने कहा कि हर मामले की हर समय लगातार लाइव स्ट्रीमिंग की कल्पना नहीं की जा सकती।

    इस पर याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट विकास सिंह ने कहा कि उन्हें लाइव स्ट्रीमिंग से आपत्ति नहीं है बल्कि समस्या तब पैदा होती है, जब सुनवाई के छोटे-छोटे हिस्से काटकर सोशल मीडिया पर भ्रामक तरीके से प्रसारित किए जाते हैं।

    उन्होंने कहा कि कई बार इन वीडियो में भ्रामक शीर्षक और पृष्ठभूमि संगीत जोड़कर न्यायिक कार्यवाही की गलत तस्वीर पेश की जाती है।

    चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने भी कहा कि हाल की घटनाओं ने सभी को लाइव स्ट्रीमिंग की व्यवस्था पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर किया है।

    जस्टिस बागची ने कहा कि डिजिटल माध्यमों पर सूचनाओं को नियंत्रित करना आज सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। ऐसे में अदालतों को सार्वजनिक मंचों पर उपलब्ध सामग्री की सीमा तय करने पर विचार करना चाहिए और लाइव स्ट्रीमिंग को अपवाद के रूप में ही रखा जाना चाहिए।

    जब यह तर्क दिया गया कि कई पक्षकार व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित नहीं हो पाते और वे अपने मामले की सुनवाई देखना चाहते हैं तब जस्टिस बागची ने कहा कि ऐसे मामलों में वे अदालत से अनुमति लेकर सुनवाई देख सकते हैं, लेकिन अदालतें 24 घंटे का मनोरंजन चैनल नहीं हो सकतीं। इससे न्याय प्रक्रिया का तुच्छीकरण होता है।

    सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट वक्ता विकास सिंह ने जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की अदालत में हुए हंगामे और पूर्व चीफ जस्टिस बी. आर. गवई से जुड़े जूता फेंकने की घटना का भी उल्लेख करते हुए कहा कि इन घटनाओं के छोटे वीडियो सोशल मीडिया पर मजाक का विषय बना दिए गए, जिससे न्यायपालिका की गलत छवि प्रस्तुत होती है।

    केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी अदालत का समर्थन करते हुए कहा कि सुनवाई के चुनिंदा हिस्सों को संदर्भ से हटाकर सोशल मीडिया पर प्रसारित किया जाता है, जिससे भ्रामक धारणा बनती है।

    उन्होंने यह आशंका भी जताई कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की मदद से वीडियो में छेड़छाड़ कर फर्जी बयान जोड़ने जैसी घटनाएं भी सामने आ सकती हैं।

    उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2018 में संवैधानिक और राष्ट्रीय महत्व के मामलों की लाइव स्ट्रीमिंग का मार्ग प्रशस्त किया था, जबकि शीर्ष अदालत में महत्वपूर्ण मामलों की नियमित लाइव स्ट्रीमिंग वर्ष 2022 से शुरू हुई।

    अब अदालत ने इस व्यवस्था के दुरुपयोग को देखते हुए इसके स्वरूप और दायरे पर फिर से विचार करने के संकेत दिए।

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