चोट गंभीर होना जरूरी नहीं, हत्या के प्रयास की धारा 307 IPC के लिए इरादा या मौत का ज्ञान जरूरी: सुप्रीम कोर्ट
Amir Ahmad
18 Sept 2026 4:31 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हत्या के प्रयास के अपराध के लिए भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 307 लागू करने के लिए पीड़ित को लगी चोट का गंभीर या जानलेवा होना जरूरी नहीं है। इसके लिए यह देखना महत्वपूर्ण है कि चोट पहुंचाने वाले कृत्य के पीछे हत्या का इरादा था या आरोपी को इस बात का ज्ञान था कि उसके कृत्य से मौत हो सकती है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी एक पीड़ित के भाई की याचिका खारिज करते हुए की। याचिकाकर्ता ने मुकदमे की कार्यवाही काफी आगे बढ़ जाने के बाद आरोपियों के खिलाफ धारा 307 जोड़ने की मांग की थी।
मामले में पुलिस ने शुरुआत में धारा 307 के तहत FIR दर्ज की। बाद में आरोपियों के अनुरोध पर मेडिकल बोर्ड से पीड़ित की जांच कराई गई, जिसके बाद धारा 307 हटा दी गई। इसके बाद पीड़ित के भाई ने मजिस्ट्रेट के समक्ष आरोप में बदलाव कर धारा 307 समेत भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 147, 148, 149, 323, 325 और 506 जोड़ने की मांग की। मजिस्ट्रेट ने आवेदन खारिज कर दिया। इसके खिलाफ सत्र अदालत में दायर पुनरीक्षण भी खारिज हो गया।
हाईकोर्ट ने भी निचली अदालतों के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार किया, जिसके बाद पीड़ित के भाई ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। याचिकाकर्ता की ओर से मुख्य जोर इस बात पर था कि पीड़ित को लगी चोट इतनी गंभीर थी कि उससे उसकी मौत हो सकती थी।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि केवल इसलिए धारा 307 नहीं लगाई जा सकती कि पीड़ित को गंभीर चोट लगी है। चोट साधारण हो या गंभीर, वह धारा 307 लागू करने की अनिवार्य शर्त नहीं है। हालांकि, यदि कोई चोट पहुंचाई गई और उसे पहुंचाने वाले कृत्य के पीछे हत्या का इरादा या ऐसा ज्ञान है कि उस कृत्य से मौत हो सकती है, तभी धारा 307 लागू हो सकती है।
खंडपीठ ने वर्ष 2009 के स्टेट ऑफ मध्य प्रदेश बनाम काशीराम एवं अन्य मामले में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि धारा 307 के तहत दोषसिद्धि के लिए इरादे के साथ उसके क्रियान्वयन की दिशा में कोई प्रत्यक्ष कृत्य होना पर्याप्त है। ऐसी शारीरिक चोट होना जरूरी नहीं है जो मौत का कारण बन सकती हो, यहां तक कि साधारण चोट होना भी अनिवार्य नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में शुरुआत में न तो याचिकाकर्ता ने और न ही पीड़ित ने ऐसा कोई आधार उठाया था कि आरोपी का हत्या करने का इरादा था या उसे अपने कृत्य से मौत होने का ज्ञान था। जांच के दौरान भी ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया। आरोप तय होने या साक्ष्य दर्ज किए जाने के चरण में भी इस आधार को नहीं उठाया गया।
खंडपीठ ने कहा कि मुकदमे की कार्यवाही काफी आगे बढ़ने के बाद पहली बार ऐसे आधार पर धारा 307 जोड़ने की मांग की गई, इसलिए आवेदन स्वीकार नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों द्वारा धारा 307 शामिल करने से इनकार करने के फैसले को उचित ठहराते हुए याचिका खारिज की।

