हाईकोर्ट में सुनवाई की तारीख तय करते समय छुट्टियों की अवधि सामान्यतः नहीं गिनी जाएगी: सुप्रीम कोर्ट
Amir Ahmad
17 Oct 2026 1:32 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (16 अक्टूबर) को स्पष्ट किया कि यदि हाईकोर्ट किसी मामले को दो सप्ताह बाद सूचीबद्ध करने का निर्देश देता है और इस अवधि की गणना के दौरान अदालत में छुट्टियां पड़ती हैं तो रजिस्ट्री को सामान्यतः छुट्टियों की अवधि को छोड़कर दो सप्ताह की गणना करनी चाहिए। हालांकि यह संबंधित हाईकोर्ट के लागू नियमों के अधीन होगा।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने कहा कि यदि हाईकोर्ट की कोई बेंच किसी याचिका को दो सप्ताह बाद सूचीबद्ध करने का निर्देश देती है और इस अवधि के समाप्त होने के बाद की तारीख अदालत की छुट्टियों के दौरान पड़ती है, तो संबंधित हाईकोर्ट की रजिस्ट्री को सामान्यतः छुट्टियों की अवधि को गणना से बाहर रखना चाहिए।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि बेंच छुट्टियों के दौरान पड़ने वाली किसी खास तारीख पर सुनवाई का निर्देश देती है या मामले को वेकेशन बेंच के समक्ष सूचीबद्ध करने के लिए कहती है, तो रजिस्ट्री को संबंधित हाईकोर्ट के नियमों के अधीन उसी के अनुसार कार्रवाई करनी चाहिए।
बेंच ने कहा,
“न्याय के हित को बेहतर ढंग से पूरा करने के उद्देश्य से की गई ये टिप्पणियां एकरूपता सुनिश्चित करने और इस बात की रक्षा करने के लिए आवश्यक हैं कि अदालत की किसी अनजाने चूक के कारण मुकदमेबाजों को नुकसान न उठाना पड़े।”
ये टिप्पणियां कर्नाटक हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली अपील पर आईं, जिसमें 43 करोड़ रुपये से अधिक की कथित जीएसटी चोरी से जुड़े मामले में मोहम्मद कामरान को जमानत दी गई।
हाईकोर्ट में जमानत याचिका पर 12 दिसंबर, 2025 को सुनवाई हुई। उस समय संबंधित अधिकारियों को दो सप्ताह के भीतर अपनी आपत्तियां दाखिल करने का निर्देश दिया गया। हालांकि, हाईकोर्ट की शीतकालीन छुट्टियों के दौरान आरोपी के वकील की ओर से मेमो दाखिल किए जाने के बाद याचिका को 26 दिसंबर, 2025 को तत्काल सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया गया और आरोपी को जमानत दी गई।
इससे नाराज होकर राजस्व विभाग ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। विभाग ने दलील दी कि उसे सुनवाई का उचित अवसर नहीं दिया गया और आरोपी ने महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया था।
जस्टिस दीपांकर दत्ता द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि आरोपी ने अलग-अलग न्यायिक मंचों पर समानांतर राहत पाने की कोशिश की, जबकि उसने यह तथ्य नहीं बताया कि एक अलग रिट याचिका में अंतरिम रिहाई की उसकी मांग पहले ही खारिज की जा चुकी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने छुट्टियों के दौरान मामले को सूचीबद्ध करने के तरीके पर भी सवाल उठाया। कोर्ट ने कहा कि संबंधित अधिकारियों को पर्याप्त सूचना नहीं दी गई, जबकि हाईकोर्ट के आदेश में ऐसी कोई निश्चित तारीख नहीं बताई गई थी जिस पर छुट्टियों के दौरान सुनवाई होनी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा,
“सभी न्यायिक प्राधिकारियों को अंधेरे में रखते हुए समानांतर उपाय अपनाने के प्रतिवादी के आचरण की कड़ी निंदा की जानी चाहिए। आरोपी को अपनी गिरफ्तारी को चुनौती देने या जमानत के लिए अदालत का रुख करने का अधिकार हो सकता है, लेकिन पर्याप्त खुलासा किए बिना समानांतर उपाय अपनाना स्पष्ट रूप से कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि मामले को इस तरह तत्काल सूचीबद्ध करवाना “स्पष्ट रूप से अदालत को गुमराह करके दूसरों से आगे निकलने की कोशिश” थी।
सुप्रीम कोर्ट ने जमानत याचिका पर नए सिरे से विचार करने के लिए मामला हाईकोर्ट को वापस भेज दिया। हालांकि, कोर्ट ने आरोपी को मौजूदा नियमों और शर्तों के तहत अगला आदेश आने तक अंतरिम जमानत पर बने रहने की अनुमति दी।

