कोई एक समूह अनिश्चितकाल तक प्रदर्शन स्थल पर कब्जा नहीं कर सकता, सभी को विरोध का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट
Amir Ahmad
3 Nov 2026 4:47 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मौखिक रूप से कहा कि विरोध प्रदर्शन का संवैधानिक अधिकार किसी निर्धारित प्रदर्शन स्थल पर अनिश्चितकाल तक कब्जा बनाए रखने की अनुमति नहीं देता। ऐसा करने से दूसरे समूहों के समान अधिकार प्रभावित होंगे।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हालिया प्रदर्शनों से जुड़ी याचिकाओं के समूह पर सुनवाई कर रही थी। इनमें कारोबार प्रभावित होने का दावा करने वाले व्यापारियों की याचिकाओं के अलावा पुलिस की कथित ज्यादती, हिरासत में लिए जाने और प्रदर्शनों के दौरान लगाई गई पाबंदियों को चुनौती देने वाली याचिकाएं भी शामिल थीं।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा,
“आप किसी जगह पर हमेशा के लिए कब्जा नहीं कर सकते। किसान, पत्रकार आदि कहां जाएंगे? हर किसी को विरोध करने का अधिकार है। निर्धारित प्रदर्शन स्थल केवल निर्धारित अवधि के लिए दिया जाना चाहिए।”
कोर्ट ने कहा कि प्रदर्शन स्थलों का आवंटन निश्चित अवधि के लिए होना चाहिए, ताकि किसान, मजदूर, ट्रेड यूनियन, बेघर लोग और अन्य समूह भी अपने विरोध का अधिकार इस्तेमाल कर सकें।mसुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि जुलाई में हुए प्रदर्शन के लिए केवल एक दिन की अनुमति दी गई, लेकिन जंतर-मंतर पर इससे अधिक समय तक कब्जा बनाए रखा गया।
पीठ ने प्रदर्शन के अधिकार और व्यापार तथा आजीविका के अधिकार के बीच संतुलन बनाने की जरूरत पर भी जोर दिया। खासकर दिहाड़ी मजदूरों की आजीविका पर पड़ने वाले प्रभाव को ध्यान में रखने की बात कही गई।.व्यापारियों की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने दावा किया कि प्रदर्शनों के कारण कारोबार को हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। उन्होंने त्योहारों के मौसम को देखते हुए अगले दो महीनों तक प्रदर्शनों पर रोक लगाने की मांग की। व्यापारियों के वकील ने कहा कि प्रदर्शन स्थल के आसपास के इलाकों में करीब 50 लाख लोग रहते हैं और कनॉट प्लेस जैसे व्यावसायिक क्षेत्रों में दुकानें बंद रहीं तथा कारोबार लगभग ठप हो गया।
कोर्ट ने त्योहारों के दौरान प्रदर्शन रोकने की मांग करने वाली किराना कमेटी दिल्ली की याचिका पर नोटिस जारी किया। हालांकि, पीठ ने व्यापारिक संगठनों को मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शनों के आयोजकों को भी मामले में पक्षकार बनाने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि आयोजकों को पक्षकार बनाए बिना व्यापारियों की शिकायतों पर पूरी तरह विचार करना संभव नहीं होगा।
अन्य याचिकाकर्ताओं ने अक्टूबर में हुए प्रदर्शनों के दौरान कथित गैरकानूनी हिरासत, हिरासत में मारपीट, बैरिकेडिंग और पुलिस की अत्यधिक कार्रवाई के आरोप लगाए।
सुप्रीम कोर्ट ने चेहरे की पहचान करने वाली निगरानी व्यवस्था के कानूनी आधार तथा एकत्र किए गए डेटा के इस्तेमाल और सुरक्षा पर सवाल उठाने वाली याचिका पर भी नोटिस जारी किया। कोर्ट ने महिला पत्रकारों को कथित रूप से परेशान किए जाने और इस मामले की जांच के लिए अलग समिति गठित करने की मांग वाली याचिका पर दिवाली के बाद अलग से सुनवाई करने पर सहमति जताई।
वकीलों के संगठनों ने अधिवक्ताओं को हिरासत में लिए जाने, इंटरनेट सेवाओं में व्यवधान और अदालतों तथा चैंबरों तक पहुंच पर पाबंदियों से जुड़े मुद्दे उठाए। पत्रकारों के साथ कथित मारपीट, हिरासत, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जब्त करने और पुलिस कार्रवाई से जुड़ी याचिकाओं पर भी सुनवाई हुई। इनमें अवमानना की कार्यवाही से जुड़े मामले भी शामिल थे।
पीठ ने संबंधित सभी याचिकाओं को अलग-अलग सुनवाई के लिए नौ श्रेणियों में बांटने का फैसला किया। कोर्ट ने वकीलों से प्रत्येक श्रेणी में दलीलें रखने का प्रस्तावित क्रम और इसके लिए अनुमानित समय बताने को कहा।
कोर्ट ने संकेत दिया कि आमतौर पर नई रिट याचिकाओं पर तब तक विचार नहीं किया जाएगा, जब तक एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड यह प्रमाणित न करे कि उनमें पूरी तरह नया और अलग मुद्दा उठाया गया।
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