राजस्थान में नदियों के प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, प्रदूषण फैलाने वालों पर गंभीर धाराएं लगाने का दिया निर्देश

Amir Ahmad

24 July 2026 12:25 PM IST

  • राजस्थान में नदियों के प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, प्रदूषण फैलाने वालों पर गंभीर धाराएं लगाने का दिया निर्देश

    सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान में नदियों और जल स्रोतों के बढ़ते प्रदूषण पर गंभीर चिंता जताते हुए राज्य सरकार से जवाब तलब किया। अदालत ने कहा कि यदि समाचारों में प्रकाशित आरोप सही पाए जाते हैं तो यह पर्यावरण कानूनों के पालन में व्यापक प्रशासनिक विफलता का संकेत है।

    इसके साथ ही अदालत ने राज्य सरकार से पूछा कि बिना शोधन किए औद्योगिक अपशिष्ट छोड़ने वाले उद्योगों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता और सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम की गंभीर धाराएं क्यों नहीं लगाई गईं।

    जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ जोजरी-बांडी-लूणी नदी तंत्र के संरक्षण और पुनर्जीवन की निगरानी कर रही उच्चस्तरीय पारिस्थितिकी पर्यवेक्षण समिति की दूसरी स्थिति रिपोर्ट पर सुनवाई कर रही थी।

    सुनवाई के दौरान अदालत ने राजस्थान सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू का ध्यान हाल में प्रकाशित समाचारों की ओर दिलाया। इनमें दावा किया गया कि जोजरी नदी के पास तनावड़ा क्षेत्र में एक तालाब का पानी औद्योगिक प्रदूषण के कारण गुलाबी हो गया और वह इंसानों व पशुओं के उपयोग के लायक नहीं रहा। अन्य रिपोर्टों में सांगानेर, द्रव्यवती और नेवटा क्षेत्र में बड़ी संख्या में बिना पर्यावरणीय स्वीकृति वाले उद्योगों के संचालन तथा बिना शोधन किए रासायनिक अपशिष्ट जल स्रोतों में छोड़े जाने के आरोप लगाए गए। एक रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि सांगानेर-सीतापुरा औद्योगिक क्षेत्र का दूषित पानी करीब 56 किलोमीटर दूर मोरेल बांध तक पहुंच गया, जिससे खेती, भूजल और कई गांव प्रभावित हुए।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये रिपोर्टें प्रथमदृष्टया अत्यंत गंभीर पर्यावरणीय चिंता पैदा करती हैं और इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि ये आरोप सही हैं तो इससे जल स्रोतों, भूजल, कृषि भूमि, वन्यजीव और लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ रहा है तथा संबंधित विभाग पर्यावरण कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करने में विफल रहे हैं।

    अदालत ने कहा कि राज्य के अलग-अलग हिस्सों से लगातार इस तरह की शिकायतें सामने आना इस बात का संकेत है कि समस्या केवल कुछ स्थानों तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक स्तर पर व्यवस्था की विफलता हो सकती है। इसलिए राज्य सरकार को पूरे मामले की जांच कर विस्तृत जवाब देना होगा।

    खंडपीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह विस्तृत हलफनामा दाखिल कर प्रत्येक आरोप की तथ्यात्मक स्थिति, संबंधित अधिकारियों की भूमिका, अब तक की गई कार्रवाई, जिम्मेदारी तय किए जाने की स्थिति और भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए अल्पकालिक एवं दीर्घकालिक उपायों की जानकारी दे।

    सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि बिना शोधन किए औद्योगिक अपशिष्ट छोड़ने से जल स्रोत, सरकारी भूमि, लोगों की आजीविका और प्राकृतिक आवास प्रभावित होते हैं। ऐसे मामलों में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 272, धारा 326(क) और 326(ग) के साथ सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम के प्रावधान भी लागू होते हैं। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि लंबित और भविष्य के सभी मामलों में इन गंभीर धाराओं को भी शामिल करने की प्रक्रिया तत्काल शुरू की जाए।

    इसके अलावा अदालत ने उच्चस्तरीय समिति की दूसरी रिपोर्ट में उठाए गए सभी मुद्दों और सिफारिशों पर अलग से हलफनामा दाखिल करने का भी निर्देश दिया।

    समिति ने अपनी रिपोर्ट में नदी तटों और बाढ़ क्षेत्र के सीमांकन में कमी, नदी क्षेत्र में औद्योगिक गतिविधियों, काकाणी में प्रस्तावित औद्योगिक क्षेत्र, वन्यजीवों पर प्रदूषण के असर तथा राजस्थान नदी बेसिन एवं जल संसाधन नियोजन प्राधिकरण को अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता जैसे कई मुद्दे उठाए।

    अदालत ने मेलबा और मोडाथली गांवों की चिन्हित भूमि वन विभाग को शीघ्र हस्तांतरित कर वहां वन एवं घासभूमि विकसित करने का निर्देश भी दिया। साथ ही सांगरिया स्थित साझा अपशिष्ट शोधन संयंत्र में जमा बिना शोधन किए गए अपशिष्ट के वैज्ञानिक उपचार और सुरक्षित निस्तारण की कार्ययोजना तैयार करने का आदेश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसकी अनुमति के बिना संबंधित उद्योगों का संचालन दोबारा शुरू नहीं किया जाएगा।

    सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव को सभी निर्देशों के पालन के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराते हुए अगली सुनवाई पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित रहने का निर्देश दिया।

    मामले की अगली सुनवाई 4 अगस्त को होगी।

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