ट्रेन के कोच में पेशाब करने और हंगामा करने के आरोपी न्यायिक अधिकारी पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, पुनर्बहाली पर रोक
Amir Ahmad
12 Jan 2026 3:59 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाइकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगाई, जिसमें न्यायिक अधिकारी की बर्खास्तगी रद्द करते हुए उसकी पुनर्बहाली का निर्देश दिया गया था। उक्त न्यायिक अधिकारी पर ट्रेन यात्रा के दौरान उपद्रव मचाने महिला यात्री के सामने अश्लील हरकत करने और कोच में पेशाब करने के गंभीर आरोप हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि संबंधित न्यायिक अधिकारी का आचरण सबसे गंभीर किस्म का घोर कदाचार है और उसे सेवा से बर्खास्त ही किया जाना चाहिए। कोर्ट ने मामले को चौंकाने वाला बताते हुए कहा कि यह आचरण घिनौना है।
जस्टिस संदीप मेहता ने टिप्पणी की,
“उसने कोच में पेशाब किया! वहां एक महिला मौजूद थी।”
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने इस मामले में नोटिस जारी किया। यह याचिका मध्य प्रदेश हाइकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल द्वारा डिवीजन बेंच के आदेश को चुनौती देते हुए दायर की गई।
सुनवाई के दौरान, प्रतिवादी की ओर से (कैविएट पर उपस्थित) वकील ने दलील दी कि मेडिकल जांच रिपोर्ट के अनुसार, संबंधित समय पर न्यायिक अधिकारी नशे की हालत में नहीं था।
मामले की पृष्ठभूमि
रिकॉर्ड के अनुसार, प्रतिवादी नंबर-1, जो मध्य प्रदेश में सिविल जज (क्लास–II) के पद पर कार्यरत था, उसको वर्ष 2018 में ट्रेन में कथित उपद्रव के चलते सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। उस पर आरोप था कि उसने नशे की हालत में सहयात्रियों के साथ बदसलूकी की, टीटीई/कंडक्टर (जो उस समय ड्यूटी पर सार्वजनिक सेवक था) के साथ गाली-गलौज की एक महिला यात्री के सामने अश्लील हरकत की और सीट पर पेशाब किया। आरोप यह भी था कि उसने अपना पहचान पत्र दिखाकर यात्रियों को धमकाया।
इसके अलावा वह बिना पूर्व अनुमति या नियंत्रक अधिकारी/जिला जज को सूचना दिए यात्रा कर रहा था।
घटना के बाद उसके खिलाफ दो समानांतर कार्यवाहियां शुरू की गईं आपराधिक और दूसरी विभागीय। गिरफ्तारी के बाद उसे जमानत मिल गई, लेकिन उसने इसकी सूचना अपने नियंत्रक अधिकारी को नहीं दी।
आपराधिक मामले में उसे बरी कर दिया गया, क्योंकि टीटीई और पीड़ित महिला सहित गवाह मुकर गए। हालांकि, विभागीय जांच में कई गवाहों ने उसके “अश्लील आचरण”, अधिकारों के दुरुपयोग और लोक सेवक के कार्य में बाधा डालने की पुष्टि की।
जांच अधिकारी द्वारा सभी आरोप सिद्ध पाए जाने के बाद प्रशासनिक समिति ने उसकी सेवा से हटाने की सिफारिश की, जिसे हाइकोर्ट की फुल बेंच ने भी मंजूरी दी। इसके बाद राज्यपाल द्वारा बर्खास्तगी का आदेश जारी किया गया।
हाइकोर्ट का आदेश और चुनौती
इस आदेश से आहत होकर न्यायिक अधिकारी ने हाइकोर्ट का रुख किया। डिवीजन बेंच ने आंशिक रूप से याचिका स्वीकार करते हुए राज्यपाल के बर्खास्तगी आदेश रद्द कर दिया, जबकि जांच अधिकारी, प्रशासनिक समिति और फुल बेंच द्वारा दोष सिद्ध होने के समान निष्कर्ष मौजूद थे।
डिवीजन बेंच ने न्यायिक अधिकारी की पुनर्बहाली का निर्देश देते हुए केवल इतनी छूट दी कि बिना अनुमति यात्रा करने और गिरफ्तारी की सूचना न देने के आरोपों पर मामूली दंड लगाया जा सकता है।
इस आदेश को चुनौती देते हुए हाइकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में वर्तमान याचिका दायर की। याचिका में कहा गया कि संबंधित अधिकारी का आचरण न्यायिक अधिकारी के पद के सर्वथा प्रतिकूल था और यह घटना व्यापक रूप से रिपोर्ट हुई, जिससे पूरी न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंची।
याचिका में यह भी रेखांकित किया गया कि जहां आपराधिक मामलों में प्रमाण का मानक “संदेह से परे” होता है, वहीं विभागीय कार्यवाही में “संभावनाओं के प्राबल्य” का सिद्धांत लागू होता है। इसके बावजूद डिवीजन बेंच ने आपराधिक मामले में बरी होने को आधार बनाकर विभागीय कार्रवाई में हस्तक्षेप किया, जो सेवा कानून के सिद्धांतों के विपरीत है।
याचिका के अनुसार, दंड की आनुपातिकता के नाम पर डिवीजन बेंच द्वारा स्वयं दंड निर्धारित करना न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर था और इससे जांच अधिकारी, प्रशासनिक समिति और फुल बेंच के तर्कपूर्ण निष्कर्षों को निष्प्रभावी कर दिया गया।

