बुजुर्ग और असाध्य रोगों से पीड़ित कैदियों की समयपूर्व रिहाई के लिए 3 महीने में नीति बनाएं राज्य: सुप्रीम कोर्ट
Amir Ahmad
16 July 2026 5:55 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे तीन महीने के भीतर बुजुर्ग और असाध्य रोगों से पीड़ित कैदियों की समयपूर्व या समय से पहले रिहाई के लिए स्पष्ट नीति तैयार कर उसे अधिसूचित करें। अदालत ने ऐसे मामलों के निस्तारण के लिए तकनीक आधारित एक समान व्यवस्था लागू करने का भी निर्देश दिया।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने यह आदेश राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया। याचिका में 70 वर्ष से अधिक आयु के बुजुर्ग, गंभीर रूप से बीमार, अशक्त और असाध्य रोगों से पीड़ित कैदियों की मानवीय आधार पर रिहाई के लिए पूरे देश में एक समान दिशा-निर्देश बनाने की मांग की गई।
याचिका में कहा गया कि जेलों में बुजुर्ग और गंभीर रूप से बीमार कैदियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। पर्याप्त चिकित्सा सुविधाओं के अभाव के बावजूद ऐसे कई कैदी जेल में बंद हैं, जिससे संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत प्राप्त समानता और जीवन के अधिकार का उल्लंघन होता है। यह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के भी विपरीत है।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि समयपूर्व रिहाई से संबंधित सभी आवेदन ई-प्रिजन्स पोर्टल के माध्यम से ही संसाधित किए जाएं। इस पोर्टल पर आवेदन दाखिल होने से लेकर मेडिकल जांच, जेल अधिकारियों की रिपोर्ट, मेडिकल बोर्ड और विचाराधीन कैदी समीक्षा समिति की सिफारिश, सक्षम प्राधिकारी के अंतिम निर्णय तथा उसके कारणों तक की पूरी प्रक्रिया दर्ज की जाएगी।
अदालत ने यह भी कहा कि पोर्टल में समयबद्ध प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए स्वत: चेतावनी और समय-सीमा की निगरानी की व्यवस्था हो। साथ ही अनुपालन रिपोर्ट तैयार करने और राज्य सरकारों, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों तथा अन्य सक्षम प्राधिकारियों को निगरानी की सुविधा भी उपलब्ध कराई जाए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस दौरान कैदियों की मेडिकल और व्यक्तिगत जानकारी की गोपनीयता पूरी तरह सुरक्षित रखी जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को विधि एवं न्याय मंत्रालय, गृह मंत्रालय और राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र के माध्यम से राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को तकनीकी सहायता, डिजिटल ढांचा, सॉफ्टवेयर सहयोग और प्रशिक्षण उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। साथ ही राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र को ई-प्रिजन्स पोर्टल को उन्नत और सुव्यवस्थित करने का भी आदेश दिया, ताकि पूरे देश में एक समान डिजिटल प्रणाली के जरिए ऐसे मामलों की निगरानी और निस्तारण हो सके।
अदालत ने केंद्र सरकार तथा सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को छह महीने के भीतर अनुपालन हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। इसमें अदालत के आदेशों के पालन के लिए उठाए गए कदम, नई नीति की स्थिति, रिहाई के लिए चिन्हित कैदियों का विवरण तथा विचाराधीन मामलों की जानकारी देनी होगी।
मामले की अगली सुनवाई 19 जनवरी 2027 को होगी, जब सुप्रीम कोर्ट अनुपालन रिपोर्टों पर विचार करेगा।


