छह साल की सौतेली बेटी से दुष्कर्म और हत्या के दोषी की फांसी सुप्रीम कोर्ट ने उम्रकैद में बदली

  • छह साल की सौतेली बेटी से दुष्कर्म और हत्या के दोषी की फांसी सुप्रीम कोर्ट ने उम्रकैद में बदली

    सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश में छह साल की सौतेली बेटी से दुष्कर्म और उसकी हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति की मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए फांसी की सजा उम्रकैद में बदलने का आदेश दिया।

    आरोपी वारिस को जावरा की पॉक्सो विशेष अदालत ने 17 दिसंबर 2018 को IPC की धारा 376(2)(F), 376(2)(N), 376(AB), 302 और 201 तथा POCSO Act की धारा 5/6 के तहत दोषी ठहराया था। ट्रायल कोर्ट ने धारा 376AB और 302 के तहत उसे मौत की सजा सुनाई थी।

    इसके अलावा IPC की धारा 201 के तहत पांच साल के कठोर कारावास की सजा भी दी गई।मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बाद में उसकी दोषसिद्धि और मौत की सजा दोनों बरकरार रखी थी। इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

    मृत बच्ची वारिस की तीसरी पत्नी की पहली शादी से हुई बेटी थी। हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष के इस मामले को स्वीकार किया कि वारिस ने बच्ची का यौन उत्पीड़न किया। अदालत ने बच्ची की मां की गवाही के साथ मेडिकल और DNA साक्ष्यों पर भी भरोसा किया।

    पोस्टमार्टम में बच्ची के शरीर पर कई चोटें मिली थीं। मेडिकल बोर्ड ने मौत का कारण गला दबाने से दम घुटना बताया था। DNA रिपोर्ट में बच्ची के कपड़ों पर मिले पुरुष Y क्रोमोसोम का DNA प्रोफाइल वारिस के Y क्रोमोसोम DNA प्रोफाइल से मेल खाता पाया गया।

    बच्ची की मां ने गवाही दी थी कि वारिस कई मौकों पर उसकी बेटी का यौन उत्पीड़न करता था और उसके साथ मारपीट भी करता था। उसके मुताबिक, 21 अप्रैल 2018 को वारिस ने बच्ची के साथ मारपीट और यौन उत्पीड़न किया। अगले दिन मां ने बच्ची की दबे स्वर में आती चीखें सुनीं और वहां पहुंचने पर वारिस को बच्ची की गर्दन से हाथ हटाते देखा। इसके बाद बच्ची गिर गई।

    हाईकोर्ट ने वारिस की घटना के समय वहां मौजूद नहीं होने की दलील यानी अलिबी को भी खारिज कर दिया था। अदालत ने उसके अपने बयान और बचाव पक्ष के गवाहों के बयानों में विरोधाभास पाया। अदालत ने यह भी नोट किया कि जिन लोगों के साथ घटना के दिन होने का दावा आरोपी ने किया, उन्हें बचाव पक्ष के गवाह के तौर पर पेश नहीं किया गया।

    अदालत ने यह भी पाया था कि आरोपी ने अपराध छिपाने की कोशिश की। बच्ची की गंभीर हालत के बावजूद उसे डॉक्टर के पास नहीं ले जाया गया और यौन उत्पीड़न के समय पहने गए उसके कपड़ों को छिपा दिया गया। हाईकोर्ट के अनुसार, पुलिस को सूचना दिए जाने से पहले बच्ची के शव का अंतिम संस्कार कराने की भी कोशिश की गई।

    हाईकोर्ट ने माना था कि बच्ची को गंभीर श्रेणी के प्रवेशात्मक यौन हमले का शिकार बनाया गया, क्योंकि आरोपी उसका सौतेला पिता था और उसके साथ घरेलू संबंध में था। अदालत ने कहा था कि बच्ची के साथ कुछ समय तक दुष्कर्म किया गया और अंततः उसकी हत्या कर दी गई।

    मौत की सजा पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य और मच्छी सिंह बनाम पंजाब राज्य के फैसलों का हवाला दिया। इन फैसलों के अनुसार, मौत की सजा देने से पहले अपराध से जुड़े गंभीर पहलुओं और आरोपी से जुड़े कम गंभीर या राहत देने वाले पहलुओं के बीच संतुलन पर विचार करना जरूरी है।

    हाईकोर्ट ने शंकर किसानराव खाड़े बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में तय 'क्राइम टेस्ट', 'क्रिमिनल टेस्ट' और 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर टेस्ट' का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि क्राइम टेस्ट में अपराध के लिए आरोपी की भूमिका को पूरी तरह साबित होना चाहिए, जबकि क्रिमिनल टेस्ट में आरोपी के पक्ष में मौजूद परिस्थितियों पर विचार किया जाना चाहिए। इसके बाद ही यह तय किया जाना चाहिए कि मामला 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' श्रेणी में आता है या नहीं।

    हाईकोर्ट ने मामले की परिस्थितियों को बेहद गंभीर मानते हुए निष्कर्ष निकाला था कि यह अपराध 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' श्रेणी में आता है और मौत की सजा उचित है।

    हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। इस तरह आरोपी की अपराध में दोषसिद्धि कायम रही, लेकिन उसे दी गई फांसी की सजा अब उम्रकैद में तब्दील हो गई।

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