सिर्फ अलग मुद्दा तय न होने पर मुकदमा ट्रायल कोर्ट को वापस नहीं भेज सकती अपीली अदालत: सुप्रीम कोर्ट
Amir Ahmad
17 Aug 2026 5:14 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि अपीली अदालत को केवल इसलिए किसी मामले को ट्रायल कोर्ट में वापस नहीं भेजना चाहिए कि किसी खास मुद्दे को अलग से तय नहीं किया गया। यदि पक्षकारों की दलीलें, पेश किए गए साक्ष्य और पहले से तय मुद्दे रिकॉर्ड पर मौजूद हैं और उन्हीं के आधार पर विवाद का फैसला किया जा सकता है तो अपीली अदालत को स्वयं मामले का निर्णय करना चाहिए।
जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें मामले को दोबारा सुनवाई के लिए ट्रायल कोर्ट भेज दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने पहली अपील को फिर से हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में बहाल किया।
मामला हिंदू अविभाजित परिवार की संपत्ति की बिक्री से जुड़ा था। परिवार के कर्ता ने बेटी की शादी के लिए लिए गए कर्ज को चुकाने की कानूनी आवश्यकता के चलते परिवार की संपत्ति खरीदार को बेच दी थी। बिक्री विलेख को लेकर सह-हिस्सेदारों ने आपत्ति जताई।
ट्रायल कोर्ट ने पक्षकारों की दलीलों और तय किए गए मुद्दों के आधार पर बिक्री विलेख को वैध माना था। इसके खिलाफ वादी सह-हिस्सेदारों ने कर्नाटक हाईकोर्ट की धारवाड़ पीठ में पहली अपील दाखिल की।
हाईकोर्ट ने मामले को ट्रायल कोर्ट वापस भेज दिया। हाईकोर्ट का मानना था कि ट्रायल कोर्ट ने इस बात पर अलग से मुद्दा तय नहीं किया कि बिक्री विलेख केवल दिखावटी था या नहीं। इसी तरह सीमा अवधि से जुड़ा मुद्दा भी स्पष्ट रूप से तय नहीं किया गया।
खरीदार ने हाईकोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उसकी ओर से दलील दी गई कि यदि पहली अपीली अदालत को लगता भी था कि सीमा अवधि या बिक्री विलेख के दिखावटी होने से जुड़े पर्याप्त मुद्दे तय नहीं हुए हैं तो वह स्वयं उन सवालों पर फैसला कर सकती थी। मामले को दोबारा ट्रायल कोर्ट भेजना जरूरी नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार किया।
जस्टिस भट्टी द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि हाईकोर्ट ने मामले को अनावश्यक रूप से ट्रायल कोर्ट वापस भेज दिया, जबकि उसके सामने वही दलीलें, तथ्य और साक्ष्य मौजूद थे जिनके आधार पर संबंधित मुद्दों का फैसला किया जा सकता था।
पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के अश्विनी कुमार के. पटेल बनाम उपेंद्र जे. पटेल मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जब आवश्यक सामग्री हाईकोर्ट के सामने उपलब्ध हो, तो उसे खुद अपील का फैसला करना चाहिए। वह ट्रायल कोर्ट के आदेश में बताए गए विभिन्न पहलुओं पर विचार कर यह तय कर सकती है कि आदेश बरकरार रखा जाए, बदला जाए या रद्द किया जाए।
अदालत ने पी. पुरुषोत्तम रेड्डी बनाम प्रताप स्टील्स लिमिटेड के फैसले का भी उल्लेख किया। उसमें कहा गया कि यदि ट्रायल कोर्ट ने किसी विशेष मुद्दे को तय नहीं किया, तब भी पहली अपीली अदालत उपलब्ध सामग्री के आधार पर उस सवाल पर फैसला कर सकती है। पहली अपील की अदालत के सामने मामले से जुड़े तथ्य और कानून के सभी सवाल विचार के लिए खुले होते हैं।
मौजूदा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पक्षकार पहले ही अपने दायित्व और प्रमाण के आधार पर मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य पेश कर चुके थे। ऐसी स्थिति में मामले को दोबारा ट्रायल कोर्ट भेजकर नए सिरे से मुद्दे तय करने, अतिरिक्त साक्ष्य लेने और पक्षकारों को फिर से साक्ष्य पेश करने का अवसर देने की जरूरत नहीं थी।
पीठ ने कहा,
“मुकदमे को वापस भेजना सामान्य प्रक्रिया के रूप में नहीं अपनाया जाना चाहिए। मौजूदा मामले में पक्षकारों ने अपने ऊपर निर्धारित प्रमाण के भार के अनुसार मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य पेश किए थे। पहली अपीली अदालत के सामने विवादित बिंदुओं का फैसला करने में कोई बाधा नहीं थी।”
अदालत ने आगे कहा कि ऐसी परिस्थितियों में ट्रायल कोर्ट को मामले की वापसी सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय कानूनी सिद्धांतों के पूरी तरह विपरीत थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट का पुनर्विचार आदेश रद्द करते हुए पहली अपील को हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में बहाल किया। अब हाईकोर्ट उपलब्ध दलीलों और साक्ष्यों के आधार पर मामले का स्वयं फैसला करेगा।


