जस्टिस एससी शर्मा के बेटे का चुनाव आयोग के वकील होने की जानकारी सामने आई, न्यायिक औचित्य पर उठे सवाल

  • जस्टिस एससी शर्मा के बेटे का चुनाव आयोग के वकील होने की जानकारी सामने आई, न्यायिक औचित्य पर उठे सवाल

    सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा के बेटे के मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के सरकारी वकील होने की जानकारी सामने आने के बाद न्यायिक औचित्य से जुड़े सवाल उठे हैं।

    जस्टिस शर्मा उन दो मामलों की सुनवाई करने वाली पीठ का हिस्सा रहे हैं जिनका संबंध चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया और चुनाव आयोग से जुड़े एक अन्य मामले से है।

    जस्टिस शर्मा उस पीठ में शामिल थे जिसने 2023 के उस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की थी जिसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया निर्धारित की गई।

    23 सितंबर को जस्टिस शर्मा ने इस मामले को संविधान पीठ के समक्ष भेजे जाने की आवश्यकता बताई जबकि जस्टिस दीपांकर दत्ता की राय इससे अलग थी। इसके बाद मामला संविधान पीठ को भेज दिया गया।

    जस्टिस शर्मा ने अपनी राय में प्रथम दृष्टया मौजूदा नियुक्ति प्रक्रिया को मंजूरी देते हुए कहा था कि केवल इसलिए चयन समिति को पक्षपाती नहीं माना जा सकता कि उसमें कार्यपालिका का बहुमत है।

    इसी दिन जस्टिस शर्मा की अध्यक्षता वाली एक अन्य पीठ ने नोएडा की जिलाधिकारी मेधा रूपम की याचिका पर सुनवाई की थी। रूपम ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें अप्रैल में हुए श्रमिक प्रदर्शन के सिलसिले में एक छात्र को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत में लेने के उनके आदेश की आलोचना की गई। हाईकोर्ट ने छात्र को पांच लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था, जिसकी वसूली रूपम के वेतन से की जानी थी।

    जस्टिस शर्मा की पीठ ने अंतरिम राहत देते हुए हाईकोर्ट की प्रतिकूल टिप्पणियों और वेतन से वसूली के आदेश पर रोक लगाई थी।

    इस मामले में एक अन्य तथ्य भी महत्वपूर्ण है। मेधा रूपम, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी हैं।

    मेधा रूपम की याचिका जस्टिस शर्मा की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किए जाने को लेकर पहले ही सवाल उठे थे, क्योंकि संबंधित विषय की नियमित सुनवाई का रोस्टर इस पीठ के पास नहीं था।

    वहीं जस्टिस बीवी नागरत्ना की अध्यक्षता वाली एक अन्य पीठ पहले से संबंधित मामलों की सुनवाई कर रही थी। ऐसे में मौजूदा रोस्टर से अलग जस्टिस शर्मा की पीठ के समक्ष इस मामले को विशेष रूप से सूचीबद्ध किए जाने पर कुछ लोगों ने सवाल उठाए।

    अब जस्टिस शर्मा के बेटे का चुनाव आयोग से पेशेवर संबंध होने की जानकारी सामने आने के बाद इन सवालों ने एक और आयाम ले लिया।

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की वेबसाइट के अनुसार जस्टिस शर्मा के बेटे जिन्होंने 2017 में वकील के रूप में पंजीकरण कराया, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चुनाव आयोग के सरकारी वकील हैं। वह केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड और आयकर विभाग के भी वकील हैं।

    जस्टिस शर्मा के छोटे बेटे ने 2020 में अधिवक्ता के रूप में पंजीकरण कराया और वह मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग के सरकारी पैनल में वकील हैं।

    यह स्पष्ट नहीं है कि जस्टिस शर्मा ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े मामले और मेधा रूपम से संबंधित मामले में पक्षकारों के समक्ष अपने बेटे के चुनाव आयोग से पेशेवर संबंध का खुलासा किया था या नहीं।

    इस घटनाक्रम के संदर्भ में न्यायिक निष्पक्षता और उसके प्रत्यक्ष आभास से जुड़े सवाल उठाए जा रहे हैं। सवाल केवल यह नहीं है कि किसी मामले में जज का निर्णय वास्तव में उनके पारिवारिक पेशेवर संबंध से प्रभावित हुआ या नहीं, बल्कि यह भी है कि परिस्थितियां किसी निष्पक्ष पर्यवेक्षक को संभावित हितों के टकराव की आशंका पैदा करती हैं या नहीं।

    कानूनी व्यवस्था में यह सिद्धांत लंबे समय से दोहराया जाता रहा है कि न्याय केवल किया ही नहीं जाना चाहिए, बल्कि होते हुए दिखाई भी देना चाहिए।

    इसी संदर्भ में यह सवाल उठाया जा रहा है कि जब किसी जज का बेटा चुनाव आयोग का वकील हो, तब चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित कानून को चुनौती देने वाले मामले और मुख्य चुनाव आयुक्त की बेटी से जुड़े मामले की सुनवाई में न्यायिक औचित्य को लेकर क्या अतिरिक्त सावधानी अपेक्षित थी।

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