दुष्कर्म मामले में बरी होने से पितृत्व का सवाल खत्म नहीं होता, DNA जांच जरूरी हो सकती है: सुप्रीम कोर्ट

Amir Ahmad

10 Jun 2026 3:36 PM IST

  • दुष्कर्म मामले में बरी होने से पितृत्व का सवाल खत्म नहीं होता, DNA जांच जरूरी हो सकती है: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी व्यक्ति का दुष्कर्म के आपराधिक मामले में बरी हो जाना पितृत्व संबंधी विवाद के निपटारे में बाधा नहीं बन सकता।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि जब जैविक पिता की पहचान का प्रश्न अन्य साक्ष्यों से निर्णायक रूप से हल नहीं हो सकता, तब DNA जांच आवश्यक और अपरिहार्य हो जाती है।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेकापम कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने एक व्यक्ति की अपील खारिज करते हुए उसे DNA जांच कराने का निर्देश दिया।

    यह विवाद एक 27 वर्षीय युवक द्वारा दायर दीवानी मुकदमे से जुड़ा है, जिसमें उसने खुद को अपीलकर्ता का जैविक पुत्र बताते हुए उसकी संपत्ति में हिस्सेदारी का दावा किया।

    मामले की शुरुआत वर्ष 1999 से जुड़ी है। याचिकाकर्ता युवक का जन्म सितंबर 1999 में हुआ था। उसका दावा है कि वह अपनी मां और अपीलकर्ता के बीच संबंधों के परिणामस्वरूप जन्मा था। दूसरी ओर, अपीलकर्ता लगातार इस दावे से इनकार करता रहा है।

    अपीलकर्ता ने अपने पक्ष में यह तर्क दिया कि युवक की मां द्वारा दर्ज कराए गए दुष्कर्म के मामले में वह पहले ही बरी हो चुका है। उसका कहना था कि पूर्व की न्यायिक कार्यवाहियों और अदालतों की टिप्पणियों के बाद पितृत्व के प्रश्न को दोबारा नहीं उठाया जा सकता।

    हालांकि, बालिग होने के बाद युवक ने दीवानी अदालत में मुकदमा दायर कर स्वयं को अपीलकर्ता का जैविक पुत्र घोषित किए जाने और संपत्ति में अधिकार दिए जाने की मांग की। मुकदमे के दौरान ट्रायल कोर्ट ने DNA जांच का आदेश दिया, जिसे बाद में हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा। इसी आदेश को चुनौती देते हुए अपीलकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी आपराधिक मामले में बरी होने का अर्थ केवल इतना होता है कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि संबंधित पक्षों के बीच कोई जैविक संबंध था ही नहीं।

    खंडपीठ ने कहा कि युवक ने अपना पूरा जीवन अपने जन्म और पितृत्व को लेकर विरोधाभासी दावों के बीच बिताया। यदि इस प्रश्न का अंतिम समाधान नहीं हुआ, तो संभव है कि उसे उन कानूनी अधिकारों से वंचित होना पड़े, जिनका वह वास्तव में हकदार हो सकता है।

    अदालत ने निजता के अधिकार और अपनी जैविक पहचान जानने के अधिकार के बीच संतुलन की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

    कोर्ट ने कहा कि एक ओर अपीलकर्ता का निजता का अधिकार है, वहीं दूसरी ओर युवक का यह अधिकार भी है कि वह अपने जैविक पिता की पहचान जान सके और उससे जुड़े कानूनी अधिकार स्थापित कर सके।

    अदालत ने कहा,

    "इस मामले में हमें अपीलकर्ता के निजता के अधिकार और युवक की उस इच्छा के बीच संतुलन स्थापित करना है, जिसके तहत वह अपने जीवनभर बने रहे इस प्रश्न का अंतिम उत्तर चाहता है। बचपन से उसने अपनी मां को यह कहते सुना कि अपीलकर्ता उसका पिता है, जबकि विभिन्न स्तरों पर इससे अलग निष्कर्ष सामने आते रहे। यदि इस प्रश्न का कभी स्पष्ट उत्तर नहीं मिला तो संभव है कि वह उन अधिकारों से हमेशा के लिए वंचित रह जाए, जिनका वह जैविक पुत्र होने की स्थिति में अधिकारी हो सकता है।"

    सुप्रीम कोर्ट ने यह भी गौर किया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह संकेत मिले कि संबंधित अवधि के दौरान युवक की मां का किसी अन्य पुरुष के साथ संबंध था। ऐसे में विवाद के निष्पक्ष समाधान के लिए डीएनए जांच आवश्यक है।

    इन्हीं टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी और अपीलकर्ता को DNA जांच कराने का निर्देश दिया।

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