राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग फैसला नहीं सुना सकता, उसकी भूमिका केवल सलाह देने तक: सुप्रीम कोर्ट

Amir Ahmad

29 July 2026 12:40 PM IST

  • राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग फैसला नहीं सुना सकता, उसकी भूमिका केवल सलाह देने तक: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) के पास सेवा विवादों में फैसला सुनाने का अधिकार नहीं है। आयोग केवल जांच कर सकता है और सरकार को सिफारिश या सलाह दे सकता है, लेकिन बाध्यकारी आदेश जारी नहीं कर सकता।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया, जिसमें सेवा विवाद से जुड़े मामले में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग का आदेश बरकरार रखा गया।

    अदालत ने कहा,

    "राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग को दिए गए अधिकार सीमित हैं। यह संविधान के तहत स्थापित एक महत्वपूर्ण संस्था है, जिसका उद्देश्य सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना है, लेकिन इसकी भूमिका केवल सिफारिश और सलाह देने तक सीमित है। इसे न्यायिक या अर्ध-न्यायिक संस्था की तरह विवादों का फैसला करने का अधिकार नहीं है।"

    मामला मुंबई पोर्ट प्राधिकरण की एक अनुसूचित जाति कर्मचारी से जुड़ा था। उन्हें वर्ष 2002 के कार्यालय ज्ञापन के आधार पर पदोन्नति मिली थी। बाद में वर्ष 2016 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने 2002 के कार्यालय ज्ञापन रद्द किया, जिसके बाद प्राधिकरण ने वर्ष 1997 के कार्यालय ज्ञापन के अनुसार वरिष्ठता सूची संशोधित करते हुए वर्ष 2020 में उन्हें पदावनत किया।

    इससे नाराज कर्मचारी ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग का रुख किया। आयोग ने वर्ष 2024 में उन्हें दोबारा पद पर बहाल करने और बकाया वेतन सहित अन्य लाभ देने का निर्देश दिया था।

    मुंबई पोर्ट प्राधिकरण ने आयोग के इस आदेश को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी लेकिन याचिका खारिज होने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आयोग के पास सेवा विवाद का अंतिम निर्णय देने या बकाया वेतन जैसी राहत देने का अधिकार नहीं है। अदालत ने ऑल इंडिया इंडियन ओवरसीज बैंक एससी एवं एसटी एम्प्लॉइज वेलफेयर एसोसिएशन बनाम भारत संघ मामले में दिए गए अपने पुराने फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि आयोग केवल जांच और तथ्य जुटाने तक सीमित है।

    अदालत ने कहा कि आयोग दस्तावेज मंगा सकता है, साक्ष्य दर्ज कर सकता है और तथ्यात्मक निष्कर्ष निकाल सकता है, लेकिन उन साक्ष्यों के आधार पर बाध्यकारी आदेश पारित नहीं कर सकता। वह केवल केंद्र या राज्य सरकार को आवश्यक कार्रवाई के लिए सिफारिश कर सकता है।

    खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि आयोग द्वारा बकाया वेतन के भुगतान संबंधी दिया गया निर्देश संविधान के प्रावधानों के विपरीत है और कानून की नजर में उसका कोई अस्तित्व नहीं है।

    इन्हीं टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई पोर्ट प्राधिकरण की अपील स्वीकार करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग का आदेश रद्द किया।

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