सदस्यों का अलग-अलग राज्यों में होना काफी नहीं, उद्देश्य से तय होगी मल्टी-स्टेट सहकारी संस्था की पहचान: सुप्रीम कोर्ट
Amir Ahmad
11 March 2026 12:42 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि किसी सहकारी समिति का मल्टी-स्टेट स्वरूप केवल इस आधार पर तय नहीं किया जा सकता कि उसके सदस्य अलग-अलग राज्यों में रहते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह दर्जा समिति के उद्देश्यों से तय होगा, न कि केवल सदस्यों के भौगोलिक फैलाव से।
जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने उत्तराखंड हाइकोर्ट का फैसला रद्द किया, जिसमें एक राज्य की सहकारी समिति को सिर्फ इसलिए मल्टी-स्टेट सहकारी समिति माना गया था क्योंकि उसके सदस्य दो राज्यों में फैले हुए थे।
खंडपीठ ने कहा कि कानून के अनुसार किसी संस्था को मल्टी-स्टेट सहकारी समिति तभी माना जा सकता है, जब उसके मुख्य उद्देश्य ही विभिन्न राज्यों में सदस्यों की सेवा करने के लिए बने हों।
अदालत ने कहा,
“सदस्यों का निवास या गतिविधियों का भौगोलिक फैलाव कानून में निर्धारित इस शर्त का विकल्प नहीं हो सकता कि संस्था के मुख्य उद्देश्य स्वयं बहु-राज्यीय हों।”
यह विवाद उस समय पैदा हुआ, जब वर्ष 2000 में उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम 2000 के तहत उत्तर प्रदेश का विभाजन कर उत्तराखंड राज्य बनाया गया। बाजपुर और गदरपुर की दो गन्ना उत्पादक सहकारी समितियां पहले उत्तर प्रदेश सहकारी समितियां अधिनियम 1965 के तहत पंजीकृत थीं और इनके सदस्य दोनों राज्यों के गांवों में रहते थे।
विभाजन के बाद बाजपुर समिति का कार्यक्षेत्र उत्तराखंड तक सीमित कर दिया गया, जिसके कारण उत्तर प्रदेश में रहने वाले एक गन्ना उत्पादक को सदस्यता से बाहर कर दिया गया। उसने इस फैसले को चुनौती दी।
मामले में मध्यस्थ ने यह कहते हुए किसान के पक्ष में फैसला दिया कि विभाजन के बाद समिति का कार्यक्षेत्र दो राज्यों में हो गया, इसलिए वह अपने-आप मल्टी-स्टेट सहकारी समिति बन गई। बाद में उत्तराखंड हाइकोर्ट ने भी इसी तर्क को सही ठहराया।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस निष्कर्ष से असहमति जताते हुए कहा कि किसी सहकारी संस्था के सदस्यों का अलग-अलग राज्यों में रहना उसे स्वतः मल्टी-स्टेट संस्था नहीं बना देता। अदालत ने अपने पूर्व फैसले स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश बनाम मिलकियत सिंह मामला का हवाला देते हुए कहा कि निर्णायक पहलू यह है कि क्या संस्था के मुख्य उद्देश्य ही राज्य सीमाओं के पार संचालन की मांग करते हैं।
अदालत ने बाजपुर और गदरपुर समितियों के उपनियमों का अध्ययन कर पाया कि उनके उद्देश्य स्थानीय गन्ना किसानों के हितों की रक्षा और आसपास की चीनी मिलों के साथ समन्वय तक सीमित हैं। पीठ ने कहा कि ये कार्य मूल रूप से स्थानीय प्रकृति के हैं और इनके लिए बहु-राज्यीय संचालन की आवश्यकता नहीं है।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए फैसला दिया कि बाजपुर और गदरपुर की गन्ना सहकारी समितियां मल्टी-स्टेट सहकारी समितियां नहीं हैं और उनका पुनर्गठन वैध है।

