गिरफ्तारी के आधार अपर्याप्त होने मात्र से गिरफ्तारी अवैध नहीं होती, आरोपी को वास्तविक नुकसान साबित करना होगा: सुप्रीम कोर्ट

Amir Ahmad

23 July 2026 6:17 PM IST

  • गिरफ्तारी के आधार अपर्याप्त होने मात्र से गिरफ्तारी अवैध नहीं होती, आरोपी को वास्तविक नुकसान साबित करना होगा: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी के आधारों की पूरी तरह जानकारी न देना और आधारों की अपर्याप्त जानकारी देना, दोनों अलग-अलग स्थितियां हैं। यदि गिरफ्तारी के आधार बिल्कुल नहीं बताए गए हों तो गिरफ्तारी अवैध हो सकती है, लेकिन यदि आधार बताए गए और केवल उनकी पर्याप्तता पर विवाद है तो अदालत यह देखेगी कि इससे आरोपी को वास्तव में कोई नुकसान हुआ या नहीं।

    जस्टिस एम.एम. सुन्दरेश और जस्टिस पी.बी. वराले की खंडपीठ ने मेघालय के चर्चित हनीमून हत्याकांड की मुख्य आरोपी सोनम रघुवंशी को दी गई जमानत रद्द करते हुए यह फैसला सुनाया। अदालत ने मेघालय हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के उन आदेशों को निरस्त किया, जिनमें गिरफ्तारी के आधारों में त्रुटि को जमानत देने का आधार माना गया था।

    हाईकोर्ट ने यह कहते हुए जमानत बरकरार रखी थी कि गिरफ्तारी के दस्तावेजों में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 103(1) के स्थान पर अस्तित्वहीन धारा 403(1) का उल्लेख किया गया, जिससे यह प्रतीत होता है कि गिरफ्तारी के आधार सही ढंग से नहीं बताए गए।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह ऐसा मामला नहीं है, जहां आरोपी को गिरफ्तारी के आधार बिल्कुल नहीं बताए गए हों। यहां केवल यह विवाद है कि बताए गए आधार पर्याप्त थे या नहीं।

    अदालत ने कहा,

    "गिरफ्तारी के आधार बिल्कुल न बताना और पर्याप्त कारण न बताना, दोनों अलग-अलग स्थितियां हैं। पहले मामले में गिरफ्तारी अवैध हो सकती है, जबकि दूसरे मामले में यह देखना होगा कि आरोपी को इससे क्या वास्तविक नुकसान हुआ।"

    खंडपीठ ने यह भी कहा कि सोनम रघुवंशी ने पहले गिरफ्तारी के कारणों पर संतोष जताया था। ऐसे में बाद में उसी आधार पर राहत मांगना उचित नहीं है। अदालत ने यह भी माना कि गिरफ्तारी से जुड़े इस मुद्दे को आरोपी ने पहली तीन जमानत याचिकाओं में नहीं उठाया और चौथी जमानत अर्जी में पहली बार इसे आधार बनाया।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी मामले में गिरफ्तारी के आधारों की सूचना देने में कोई कमी भी रह जाए, तब भी इससे जांच एजेंसी की दोबारा गिरफ्तारी करने की वैधानिक शक्ति समाप्त नहीं होती।

    खंडपीठ ने कहा,

    "कानून जांच एजेंसी को दोबारा गिरफ्तारी करने से नहीं रोकता। गिरफ्तारी के आधारों की सूचना देने में कमी होने का अर्थ यह नहीं है कि आगे जांच के लिए दोबारा गिरफ्तारी नहीं की जा सकती।"

    अदालत ने यह भी कहा कि यद्यपि जमानत सामान्य नियम है और जेल अपवाद, लेकिन इस मामले की परिस्थितियां अलग हैं। आरोपी की पहले दायर जमानत याचिकाएं गुण-दोष के आधार पर खारिज हो चुकी हैं और मुकदमे की सुनवाई भी शुरू हो चुकी है। ऐसे में इस चरण पर जमानत जारी रहने से मुकदमे की निष्पक्ष सुनवाई प्रभावित हो सकती है।

    इन्हीं कारणों से सुप्रीम कोर्ट ने मेघालय हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए सोनम रघुवंशी को तीन सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि छह महीने के भीतर मुकदमे की सुनवाई पूरी नहीं होती है तो वह नई जमानत याचिका दायर करने के लिए स्वतंत्र होगी और इस आदेश या पहले की जमानत खारिज होने के आदेश उसके रास्ते में बाधा नहीं बनेंगे।

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