भ्रष्टाचार मामलों में भारी-भरकम और गैरजरूरी सबूत मुकदमे लंबा खींचते हैं: सुप्रीम कोर्ट
Amir Ahmad
9 Sept 2026 3:29 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के मामलों में बड़ी संख्या में ऐसे सबूत और गवाह पेश किए जाने पर चिंता जताई, जिनका मामले के मूल आरोप से खास संबंध नहीं होता।
कोर्ट ने कहा कि भारी-भरकम और गैरजरूरी साक्ष्य अक्सर अदालतों के लिए बोझिल हो जाते हैं और भ्रष्टाचार के मुकदमों के लंबे समय तक लंबित रहने की एक वजह भी यही है।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस विनोद के. चंद्रन की पीठ ने यह टिप्पणी 1993 के फर्जी दवा आपूर्ति बिल मामले में एक पूर्व सरकारी स्टोर प्रभारी को बरी करते हुए की।
पीठ ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(d) के तहत दोषसिद्धि तब कायम नहीं रह सकती, जब यह स्पष्ट हो कि आरोपी ने खुद या किसी अन्य के लिए कोई आर्थिक लाभ हासिल नहीं किया।
मामले में असम के पशुपालन विभाग की शिकायत के बाद कार्रवाई शुरू हुई। आरोप था कि ऐसी दवाओं की आपूर्ति के फर्जी बिल पेश किए गए, जो वास्तव में पहुंचाई ही नहीं गई और भुगतान एक काल्पनिक फर्म को किया गया। इससे सरकारी खजाने को करीब 5.97 लाख रुपये का नुकसान होने का आरोप है।
इस मामले में सात लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया गया। निचली अदालत ने चार लोगों को दोषी ठहराया और तीन को बरी कर दिया बाद में गुवाहाटी हाईकोर्ट ने अपील पर लेखाकार को बरी कर दिया, लेकिन स्टोर प्रभारी और स्टोरकीपर की भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(d) के तहत दोषसिद्धि बरकरार रखी।
इसके खिलाफ स्टोर प्रभारी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले का मूल सवाल सीमित है क्या आरोपी को कोई आर्थिक लाभ नहीं मिलने की स्पष्ट निष्कर्ष के बावजूद धारा 13(1)(d) के तहत उसकी दोषसिद्धि कायम रखी जा सकती है।
धारा 13(1)(d) का उल्लेख करते हुए पीठ ने कहा कि इस प्रावधान के तहत यह साबित करना जरूरी है कि लोक सेवक ने भ्रष्ट या गैरकानूनी तरीके से, अपने पद का दुरुपयोग करके या जनहित के बिना, खुद या किसी अन्य व्यक्ति के लिए कोई मूल्यवान वस्तु या आर्थिक लाभ हासिल किया।
कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा,
“आर्थिक लाभ के बिना धारा 13(1)(d) के तहत दोषसिद्धि नहीं हो सकती।”
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पाया कि अभियोजन पक्ष ने मामले में 62 गवाह पेश किए, लेकिन गुवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले में केवल नौ गवाहों का उल्लेख किया गया। इनमें आठ पशु अस्पतालों के प्रभारी थे, जिन्होंने संबंधित अवधि में दवाओं की आपूर्ति नहीं होने की बात बताई। एक अन्य गवाह उस फर्म का वास्तविक मालिक था, जिसे दवाओं का आपूर्तिकर्ता बताया गया। उसने न तो कोई भुगतान मिलने की बात स्वीकार की और न ही दवाओं की आपूर्ति की।
पीठ ने कहा कि इतने गवाहों की गवाही के बावजूद मामले में प्रभावी रूप से केवल कुछ ही गवाह प्रासंगिक पाए गए।
अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि विभाग से रकम निकलने के बाद वह पैसा आखिर कहां गया, इसकी पड़ताल क्यों नहीं की गई।
कोर्ट ने कहा,
“हमें यह पता लगाने के लिए कोई जांच होती नहीं दिखती कि विभाग से रकम जारी होने के बाद उसका धन-प्रवाह क्या रहा।”
पीठ ने भ्रष्टाचार के मामलों में जांच और मुकदमे के दौरान भारी मात्रा में साक्ष्य पेश किए जाने की प्रवृत्ति पर भी गंभीर टिप्पणी की।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में अक्सर अनावश्यक और अप्रासंगिक साक्ष्य मुकदमे को लंबा खींचते हैं और अदालत के लिए भी स्थिति बोझिल बना देते हैं।
अदालत ने कहा,
“भ्रष्टाचार के मामलों में मुकदमों के लंबे समय तक लंबित रहने का इतिहास रहा है, खासकर इसलिए कि बहुत अधिक साक्ष्य पेश किए जाते हैं, जो अक्सर अनावश्यक और ज्यादातर अप्रासंगिक होते हैं।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य कुछ अन्य आपराधिक धाराओं के तहत आरोपों पर विचार के लिए उपयोगी हो सकते थे।
हालांकि, केंद्रीय जांच ब्यूरो ने हाईकोर्ट द्वारा उन धाराओं में आरोपी को बरी किए जाने के खिलाफ कोई चुनौती नहीं दी। ऐसे में उस चूक का लाभ आरोपी को ही मिलना था।
इन परिस्थितियों में सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत स्टोर प्रभारी की दोषसिद्धि को बरकरार रखने का कोई आधार नहीं पाया।
अदालत ने हाईकोर्ट द्वारा बरकरार रखे गए आरोपों से उसे बरी कर दिया और उसकी रिहाई का निर्देश दिया।


