बेंच बदलने से कानून नहीं बदल सकता कोऑर्डिनेट बेंच का फैसला बाध्यकारी : सुप्रीम कोर्ट

Amir Ahmad

6 Jan 2026 7:06 PM IST

  • बेंच बदलने से कानून नहीं बदल सकता कोऑर्डिनेट बेंच का फैसला बाध्यकारी : सुप्रीम कोर्ट

    गुजरात SEZ से बिजली पर अडानी पावर को कस्टम ड्यूटी में छूट देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट को स्टेयर डेसिसिस के सिद्धांत का उल्लंघन करने के लिए यह कहते हुए गलत ठहराया कि उसने गलत तरीके से एक बाध्यकारी कोऑर्डिनेट बेंच के फैसले को नज़रअंदाज़ किया और दोहराया कि बेंच बदलने से कानून नहीं बदल सकता।

    कहा गया,

    “मिसाल का अनुशासन व्यक्तिगत पसंद का मामला नहीं है; यह एक संस्थागत ज़रूरत है। स्टेयर डेसिसिस एट नॉन क्विएटा मूवेरे जिसका मतलब है कि जो तय हो गया, उस पर कायम रहना और जो तय हो गया, उसे परेशान न करना, यह एक कामकाजी नियम है, जो स्थिरता, पूर्वानुमान और न्यायिक परिणामों के लिए सम्मान सुनिश्चित करता है। बेंच बदलने से कानून नहीं बदल सकता।”

    जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने यह टिप्पणी करते हुए अडानी पावर लिमिटेड की गुजरात हाई कोर्ट के 2019 के आदेश के खिलाफ अपील को मंज़ूरी दी, जिसने 2015 में हाई कोर्ट की एक कोऑर्डिनेट बेंच द्वारा स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (SEZ) से डोमेस्टिक टैरिफ एरिया (DTA) में सप्लाई की गई बिजली पर लगाए गए कस्टम ड्यूटी की वैधता पर दिए गए बाध्यकारी मिसाल का पालन नहीं किया।

    संक्षेप में मामला

    2015 में गुजरात हाईकोर्ट की एक डिवीज़न बेंच ने SEZ से DTA में सप्लाई की गई बिजली पर कस्टम ड्यूटी लगाने को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि यह लेवी अल्ट्रा वायर्स और असंवैधानिक है। उस फैसले को बाद में सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा, जिससे वह अंतिम हो गया।

    हालांकि 2019 में उसी हाईकोर्ट की एक और कोऑर्डिनेट बेंच ने 2015 के फैसले का फायदा बाद की अवधियों और नोटिफिकेशन तक बढ़ाने से इनकार कर दिया। बाद वाली बेंच ने पिछले फैसले को एक खास नोटिफिकेशन और समय-सीमा तक सीमित करने की कोशिश की जिससे प्रभावी रूप से एक ऐसा सवाल फिर से खुल गया जो पहले ही तय हो चुका था।

    हाईकोर्ट के फैसले से नाराज़ होकर अडानी पावर ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

    हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए जस्टिस अरविंद कुमार द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया,

    “इस मामले में अगर 2019 में डिवीजन बेंच की राय थी कि 2015 का फैसला बाद के नोटिफिकेशन या बाद की अवधि पर लागू नहीं हो सकता, तो सही तरीका यह था कि इस सवाल को हाईकोर्ट की बड़ी बेंच के सामने रखने का अनुरोध किया जाए। 2019 की बेंच ने ऐसा नहीं किया। इसके बजाय, उसने 2015 के फैसले के असर को कम कर दिया और बाद के सालों के लिए राहत देने से इनकार कर दिया। यह तरीका गलत था। 2019 की बेंच 2015 में कानून की घोषणा से बंधी हुई, जब तक कि इसे विधिवत बड़ी बेंच के पास रेफर न किया जाए।”

    स्टेट ऑफ़ उत्तर प्रदेश बनाम अजय कुमार शर्मा (2016) 15 SCC 289 का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि एक बार जब हाईकोर्ट की एक कोऑर्डिनेट बेंच ने कानून के किसी सवाल पर फैसला कर लिया है तो समान ताकत वाली बाद की बेंच उसी मुद्दे का सामना करने पर उस राय का पालन करने के लिए बाध्य है।

    कोर्ट ने आगे कहा,

    “अगर बाद की बेंच को लगता है कि पहले की राय इतनी स्पष्ट रूप से गलत या लागू न होने वाली है कि उसका पालन नहीं किया जाना चाहिए तो बाद की बेंच को मामले को पुनर्विचार के लिए बड़ी बेंच के पास भेजना चाहिए। वह जो नहीं कर सकती, वह यह है कि पहले के फैसले को कृत्रिम रूप से सीमित करके या उसे तथ्य-विशिष्ट रियायत मानकर उससे बचना या उसे कमज़ोर करना।”

    अपील स्वीकार कर ली गई।

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