रेस्तरां में हुक्का बार पर रोक के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार से मांगा जवाब, 27 नवंबर को अगली सुनवाई
Amir Ahmad
17 Oct 2026 3:34 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने रेस्तरां में हुक्का बार चलाने और निर्धारित धूम्रपान क्षेत्र में भी हुक्का परोसने पर रोक लगाने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया।
कोर्ट ने अंतरिम राहत की मांग पर भी नोटिस जारी किया। मामले की अगली सुनवाई 27 नवंबर को होगी।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने मेसर्स गुड लक फूड एंड बेवरेजेज की ओर से दायर विशेष अनुमति याचिका पर यह आदेश दिया। याचिका में इलाहाबाद हाईकोर्ट के 29 सितंबर के फैसले को चुनौती दी गई।
इलाहाबाद हाईकोर्ट में जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अब्धेश कुमार चौधरी की बेंच ने हुक्का बार के संचालन और रेस्तरां में हुक्का सेवा देने से संबंधित याचिकाओं के समूह को खारिज किया था। हाईकोर्ट ने कहा था कि निर्धारित धूम्रपान क्षेत्र में भी हुक्का सेवा देना सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम, 2003 (COTPA) तथा सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान निषेध नियम, 2008 के नियम 4(3) का उल्लंघन है। इस नियम में 2017 में संशोधन किया गया।
हाईकोर्ट ने जोर दिया कि सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान न करने वाले लोगों को स्वच्छ हवा में सांस लेने का अधिकार किसी व्यावसायिक प्रतिष्ठान के कारोबार करने के हितों के कारण सीमित नहीं किया जा सकता।
कोर्ट के सामने सवाल यह नहीं था कि हुक्के के जरिए तंबाकू पीना अपने आप में प्रतिबंधित है या नहीं, बल्कि यह था कि क्या रेस्तरां और ऐसे अन्य प्रतिष्ठान निर्धारित धूम्रपान क्षेत्र में ग्राहकों को हुक्का सेवा दे सकते हैं।
हाईकोर्ट ने कहा था कि COTPA के तहत सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर रोक सामान्य नियम है, जबकि निर्धारित धूम्रपान क्षेत्र इस प्रतिबंध का अपवाद है। हालांकि, ऐसे क्षेत्र में धूम्रपान की अनुमति होने का मतलब यह नहीं है कि रेस्तरां वहां हुक्का परोसने की सेवा भी दे सकते हैं। कोर्ट के अनुसार, नियम 4(3) का संशोधित प्रावधान धूम्रपान क्षेत्र में किसी भी तरह की सेवा देने पर रोक लगाता है।
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला था कि उत्तर प्रदेश में हुक्का बार चलाना और रेस्तरां के जरिए हुक्का सेवा देना नियम 4(3) का खुला उल्लंघन है तथा COTPA के उद्देश्य और कानूनी व्यवस्था के विपरीत है।
इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए हाईकोर्ट ने 2017 में नियम 4(3) में किए गए संशोधन को महत्वपूर्ण माना था। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले नरिंदर एस. चड्ढा बनाम मुंबई नगर निगम का भी उल्लेख किया। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने नियम के पुराने प्रावधान की व्याख्या करते हुए धूम्रपान क्षेत्रों में हुक्का सेवा की अनुमति का संकेत दिया था, जबकि हुक्के के अलावा भोजन और अन्य खाद्य पदार्थों की सेवा पर रोक थी।
हालांकि, केंद्र सरकार ने 2017 में नियम 4(3) को बदल दिया। संशोधित प्रावधान में कहा गया कि धूम्रपान के लिए निर्धारित किसी भी क्षेत्र या स्थान में कोई सेवा उपलब्ध नहीं कराई जाएगी। हाईकोर्ट ने माना कि शब्दों में यह बदलाव महत्वपूर्ण है और पुराने प्रावधान की व्याख्या के आधार पर संशोधित नियम के तहत हुक्का सेवा की अनुमति नहीं दी जा सकती।
अपने फैसले के अंतिम हिस्से में हाईकोर्ट ने गुजरात, पंजाब, राजस्थान, महाराष्ट्र और कर्नाटक सहित विभिन्न राज्यों में हुक्का बार से संबंधित बनाए गए कानूनों का भी उल्लेख किया। इन राज्यों में हुक्का बार के संचालन को लेकर विशेष प्रावधान किए गए हैं और अधिक कठोर सजा तथा जुर्माने की व्यवस्था है। हाईकोर्ट ने उम्मीद जताई थी कि उत्तर प्रदेश सरकार भी आवश्यक कदम उठाएगी और निर्धारित धूम्रपान क्षेत्रों में हुक्का सेवा देने पर कड़ी सजा का प्रावधान करने के लिए अधिसूचना जारी करने पर विचार करेगी।
हाईकोर्ट ने हुक्का पीने से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों का भी उल्लेख किया और इस आम धारणा पर चिंता जताई कि हुक्का सिगरेट की तुलना में जरूरी तौर पर कम हानिकारक होता है। कोर्ट ने अपने फैसले की प्रति उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को जानकारी तथा आवश्यक अनुपालन के लिए भेजने का निर्देश दिया था।

