सिविल जज भर्ती में कानून की पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री को वकालत के बराबर नहीं माना जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
Amir Ahmad
21 Aug 2026 2:02 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने सिविल जज (जूनियर कैटगरी) की भर्ती के लिए कानून में स्नातकोत्तर डिग्री को अदालत में वकालत के अनुभव के बराबर मानने की मांग को खारिज किया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल कानून में पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री हासिल कर लेना न्यायिक सेवा में प्रवेश के लिए वकालत के व्यावहारिक अनुभव की जगह नहीं ले सकता।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने यह फैसला उन पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनाया, जिनमें 20 मई 2025 के उस फैसले को चुनौती दी गई, जिसमें निचली न्यायिक सेवा में सीधे प्रवेश के लिए पहले से कानूनी अभ्यास की शर्त बहाल की गई।
फैसला सुनाते हुए चीफ जस्टिस ने कहा,
“डिग्री को वकालत के अनुभव के बराबर माना जाना चाहिए, इस दलील को हम स्वीकार नहीं कर पाए।”
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने 2:1 के बहुमत से वकालत की अनिवार्यता लागू करने के तरीके में बदलाव किया।
जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने इस हिस्से पर असहमति जताई।
अदालत ने कहा कि 20 मई 2025 से 31 मार्च 2027 के बीच जारी होने वाली सिविल जज भर्ती की अधिसूचनाओं में सभी लॉ ग्रेजुएट आवेदन कर सकेंगे। इस अवधि में आवेदन करने के लिए तीन साल की वकालत का अनुभव अनिवार्य नहीं होगा।
इन भर्तियों में चयनित अभ्यर्थियों को पहले राज्य न्यायिक अकादमी में एक साल का प्रशिक्षण लेना होगा। इसके बाद उन्हें एक साल की संरचित कानून लिपिक सेवा करनी होगी। इन दोनों वर्षों को वकालत के अनुभव के बराबर माना जाएगा।
वहीं 1 अप्रैल 2027 या उसके बाद जारी होने वाली भर्ती अधिसूचनाओं के लिए उम्मीदवार को सिविल जज (जूनियर कैटेगरी) की परीक्षा में बैठने से पहले कम से कम एक साल की वास्तविक वकालत का अनुभव होना अनिवार्य होगा।
मई 2025 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने निचली न्यायिक सेवा में सीधे प्रवेश के लिए तीन साल की वकालत की शर्त बहाल की थी।
अदालत ने माना था कि न्यायिक सेवा में प्रवेश करने वाले व्यक्ति के लिए अदालतों के कामकाज का पहले से व्यावहारिक अनुभव उपयोगी और आवश्यक है।
मौजूदा फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने इस मूल निष्कर्ष को बरकरार रखा है। हालांकि, अदालत ने माना कि व्यावहारिक अनुभव हासिल करने के लिए संस्थागत प्रशिक्षण और निगरानी में की गई कानून लिपिक सेवा का संयोजन भी प्रभावी माध्यम हो सकता है।
अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि तीन साल की वकालत की शर्त अचानक बहाल होने से उन कानून स्नातकों को कठिनाई हुई, जो दो दशक से अधिक समय से लागू व्यवस्था के तहत न्यायिक सेवा की परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे।
इसी व्यावहारिक कठिनाई को देखते हुए अदालत ने संक्रमणकालीन व्यवस्था लागू की है। इसके तहत 31 मार्च 2027 तक जारी होने वाली भर्ती अधिसूचनाओं में तीन साल की वकालत की शर्त से छूट रहेगी लेकिन चयनित अभ्यर्थियों को दो साल का प्रशिक्षण और कानून लिपिक सेवा पूरी करनी होगी।
1 अप्रैल 2027 के बाद न्यायिक सेवा में प्रवेश के लिए वास्तविक वकालत के अनुभव की अनिवार्यता प्रभावी हो जाएगी।


