अजमेर शरीफ दरगाह पर प्रधानमंत्री द्वारा चादर चढ़ाने की परंपरा को चुनौती देने वाली याचिका खारिज

Amir Ahmad

5 Jan 2026 6:31 PM IST

  • अजमेर शरीफ दरगाह पर प्रधानमंत्री द्वारा चादर चढ़ाने की परंपरा को चुनौती देने वाली याचिका खारिज

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें अजमेर शरीफ दरगाह पर प्रधानमंत्री द्वारा चादर चढ़ाने की परंपरा को चुनौती दी गई थी। याचिका में केंद्र सरकार और उसकी संस्थाओं द्वारा सूफी संत हज़रत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती और अजमेर दरगाह को दिए जा रहे राज्य-प्रायोजित सम्मान और प्रतीकात्मक मान्यता पर भी आपत्ति जताई गई।

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने यह कहते हुए याचिका खारिज की कि इसमें मांगी गई राहत न्यायिक विचार योग्य (जस्टिसिएबल) नहीं है।

    याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि अजमेर दरगाह पर चादर चढ़ाने की परंपरा वर्ष 1947 के बाद शुरू हुई। इसका कोई संवैधानिक या कानूनी आधार नहीं है। इस पर चीफ जस्टिस ने स्पष्ट किया कि अदालत इस मुद्दे पर कोई टिप्पणी नहीं करेगी, क्योंकि यह न्यायिक हस्तक्षेप के दायरे में नहीं आता।

    सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता पक्ष ने यह भी बताया कि अजमेर दरगाह को लेकर एक दीवानी वाद ट्रायल कोर्ट में लंबित है, जिसमें दावा किया गया कि दरगाह का निर्माण एक प्राचीन शिव मंदिर के अवशेषों पर हुआ। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वर्तमान रिट याचिका खारिज किए जाने का उस लंबित दीवानी मुकदमे पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

    यह याचिका जितेंद्र सिंह और विष्णु गुप्ता द्वारा दायर की गई, जो क्रमशः विश्व वैदिक सनातन संघ और हिंदू सेना के अध्यक्ष हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती को केंद्र सरकार की विभिन्न संस्थाओं द्वारा दिया जा रहा राज्य-प्रायोजित सम्मान संविधान के विपरीत, मनमाना और ऐतिहासिक रूप से निराधार है, तथा यह गणराज्य की गरिमा और संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है।

    प्रधानमंत्री द्वारा अजमेर दरगाह पर चादर चढ़ाने के संदर्भ में याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह परंपरा पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा 1947 में शुरू की गई और तब से बिना किसी वैधानिक या संवैधानिक आधार के जारी है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के फैसले दरगाह कमेटी, अजमेर बनाम सैयद हुसैन अली का हवाला देते हुए यह भी दलील दी कि अजमेर दरगाह को संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक संप्रदाय का दर्जा प्राप्त नहीं है।

    याचिकाकर्ताओं का यह भी कहना था कि सरकार के प्रमुख द्वारा अजमेर दरगाह पर चादर चढ़ाना जनता की इच्छा के विरुद्ध है। उल्लेखनीय है कि याचिकाकर्ताओं में से एक ने इस संबंध में प्रधानमंत्री को प्रतिनिधित्व भी दिया, जिसमें उनसे अजमेर दरगाह पर चादर चढ़ाने से परहेज करने का अनुरोध किया गया।

    हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी दलीलों को सुनने के बाद याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि इस प्रकार के विषयों में न्यायिक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।

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