बिहार मतदाता सूची पुनर्विचार पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: संदिग्ध नागरिकता वाले नाम केंद्र को भेजने का निर्देश
Amir Ahmad
27 May 2026 3:42 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान की वैधता को बरकरार रखते हुए चुनाव आयोग को बड़ा निर्देश दिया।
अदालत ने कहा कि वर्ष 2003 की बिहार मतदाता सूची से जिन लोगों के नाम संदिग्ध नागरिकता के आधार पर हटाए गए, उनके मामलों को चार सप्ताह के भीतर केंद्र सरकार के सक्षम प्राधिकारी के पास भेजा जाए ताकि उनकी नागरिकता पर अंतिम फैसला हो सके।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने यह फैसला बिहार में विशेष गहन पुनर्विचार अभियान को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनाया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा,
“जिन व्यक्तियों के नाम आयोग ने इस आधार पर हटाए हैं कि वे नागरिक नहीं हैं, उनके मामलों को चार सप्ताह के भीतर नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत सक्षम प्राधिकारी को भेजा जाए।”
अदालत ने निर्देश दिया कि संबंधित प्राधिकारी कानून के अनुसार सुनवाई पूरी करे और अगला विधानसभा या स्थानीय निकाय चुनाव होने से पहले फैसला दे। साथ ही संबंधित व्यक्तियों को नोटिस देकर अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि सक्षम प्राधिकारी यह पाता है कि संबंधित व्यक्ति भारतीय नागरिक हैं, तो उनके नाम दोबारा मतदाता सूची में शामिल किए जाएं।
फैसले में अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची तैयार करने और संशोधित करने के दौरान नागरिकता से जुड़े सवालों की जांच करने का अधिकार है। हालांकि आयोग का फैसला अंतिम नहीं माना जाएगा और उसका प्रभाव केवल मतदाता सूची तक सीमित रहेगा।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा,
“आयोग को यह अधिकार है कि वह मतदाता सूची में शामिल किए जाने की पात्रता के लिए नागरिकता से जुड़े प्रश्नों की सार्थक जांच करे। लेकिन यह नागरिकता का अंतिम निर्धारण नहीं माना जाएगा।”
अदालत ने साफ किया कि चुनाव आयोग का नकारात्मक निष्कर्ष किसी व्यक्ति की नागरिकता को पूरी तरह समाप्त नहीं करता। नागरिकता का अंतिम निर्णय केवल नागरिकता कानून के तहत सक्षम प्राधिकारी ही कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी व्यक्ति का नाम गलती से मृत, अनुपस्थित, स्थानांतरित या दोहराव के आधार पर हटाया गया, तो वह न्यायिक समीक्षा के जरिए चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती दे सकता है।
अदालत ने कहा कि आयोग यदि किसी व्यक्ति की नागरिकता को लेकर संतुष्ट नहीं होता तो उसे ऐसे मामलों को केंद्र सरकार के सक्षम प्राधिकारी के पास भेजना अनिवार्य होगा।
आयोग का फैसला केवल चुनावी उद्देश्य तक सीमित रहेगा और अंतिम कानूनी स्थिति सक्षम प्राधिकारी के निर्णय पर निर्भर करेगी।

