मिस्त्री की कटी टांग को 100% कार्यात्मक दिव्यांगता माना जाए: सुप्रीम कोर्ट ने मुआवजा बढ़ाकर 40.29 लाख रुपये किया
Amir Ahmad
24 Jun 2026 4:14 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि यदि किसी मिस्त्री की घुटने के ऊपर से दाहिनी टांग कट जाती है तो उसे केवल शारीरिक दिव्यांगता के प्रतिशत के आधार पर नहीं आंका जा सकता। ऐसे मामले में उसकी कार्यात्मक दिव्यांगता 100 प्रतिशत मानी जानी चाहिए, क्योंकि वह अपने पेशे से प्रभावी रूप से वंचित हो जाता है।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ ने तमिलनाडु के एक मिस्त्री को दिए गए मुआवजे में बढ़ोतरी करते हुए इसे 29.01 लाख रुपये से बढ़ाकर 40.29 लाख रुपये कर दिया।
पीठ ने कहा कि मोटर दुर्घटना दावों में मुआवजा तय करते समय केवल शारीरिक दिव्यांगता के प्रतिशत को आधार नहीं बनाया जा सकता, बल्कि यह देखना आवश्यक है कि चोट का पीड़ित की आजीविका पर क्या प्रभाव पड़ा है।
मामला अप्रैल 2017 का है। याचिकाकर्ता अपनी साइकिल से नमक्कल-सलेम राजमार्ग पर जा रहा था, तभी पीछे से आए एक लॉरी ने उसे टक्कर मार दी। दुर्घटना में उसे गंभीर चोटें आईं और बाद में उसकी दाहिनी टांग घुटने के ऊपर से काटनी पड़ी। वह पेशे से मिस्त्री था और उसका कहना था कि इस दिव्यांगता के कारण वह अपना काम जारी नहीं रख सकता।
मेडिकल प्रमाणपत्र में उसकी स्थायी शारीरिक दिव्यांगता 70 प्रतिशत आंकी गई। मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण और मद्रास हाईकोर्ट ने इसी आधार पर उसकी आय अर्जित करने की क्षमता में 70 प्रतिशत कमी मानकर मुआवजे का निर्धारण किया था।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शारीरिक दिव्यांगता और कार्यात्मक दिव्यांगता अलग-अलग अवधारणाएं हैं। पीठ ने कहा कि मिस्त्री का काम पूरी तरह शारीरिक श्रम पर आधारित होता है और दोनों पैरों का लगातार उपयोग इसकी अनिवार्य आवश्यकता है।
अदालत ने कहा,
“दाहिनी टांग का घुटने के ऊपर से कट जाना केवल शारीरिक दिव्यांगता नहीं है, बल्कि इससे याचिकाकर्ता अपने उस शारीरिक श्रम वाले कार्य को प्रभावी ढंग से करने में असमर्थ हो गया, जो उसकी आजीविका का एकमात्र स्रोत था।”
इसके बाद अदालत ने कार्यात्मक दिव्यांगता 100 प्रतिशत मानते हुए मुआवजे की दोबारा गणना की। मासिक आय 12 हजार रुपये निर्धारित की गई, उसमें 40 प्रतिशत भविष्यगत आय वृद्धि जोड़ी गई और 17 का गुणक लागू किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने कृत्रिम पैर तथा उसके रखरखाव और समय-समय पर बदलने की आवश्यकता को देखते हुए भविष्य के मेडिकल खर्च के लिए दी गई राशि भी 1 लाख रुपये से बढ़ाकर 2 लाख रुपये की।
अदालत ने कुल मुआवजा 40,29,730 रुपये निर्धारित करते हुए उस पर 7.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का आदेश दिया। बीमा कंपनी को छह सप्ताह के भीतर बढ़ी हुई राशि जमा कराने का निर्देश भी दिया गया।

