AI से बने फर्जी फैसलों का हवाला देने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- यह केवल त्रुटि नहीं, कदाचार
Amir Ahmad
2 March 2026 12:22 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा कथित रूप से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से तैयार अस्तित्वहीन और फर्जी निर्णयों पर भरोसा किए जाने पर गंभीर आपत्ति जताई।
अदालत ने कहा कि ऐसे गैर-मौजूद और नकली निर्णयों के आधार पर दिया गया आदेश मात्र विधिक त्रुटि नहीं है बल्कि यह कदाचार की श्रेणी में आ सकता है और इसके विधिक परिणाम होंगे।
जस्टिस पामिडिघंतम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ आंध्र प्रदेश हाइकोर्ट के सिविल पुनरीक्षण आदेश से उपजी विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
खंडपीठ ने कहा,
“ट्रायल कोर्ट द्वारा AI से तैयार गैर-मौजूद फर्जी अथवा कृत्रिम निर्णयों का उपयोग न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सीधा प्रभाव डालता है। प्रारंभ में ही हम स्पष्ट कर दें कि ऐसे गैर-मौजूद और फर्जी निर्णयों पर आधारित फैसला निर्णय प्रक्रिया की साधारण त्रुटि नहीं है। यह कदाचार होगा और इसके विधिक परिणाम होंगे। इस विषय की विस्तृत जांच आवश्यक है।”
मामला एक स्थायी निषेधाज्ञा वाद से जुड़ा है, जिसमें वाद लंबित रहने के दौरान ट्रायल कोर्ट ने विवादित संपत्ति की भौतिक स्थिति दर्ज करने के लिए वकील आयुक्त नियुक्त किया।
आयुक्त की रिपोर्ट पर प्रतिवादियों ने आपत्ति उठाई लेकिन 19 अगस्त, 2025 के आदेश से ट्रायल कोर्ट ने आपत्तियां खारिज कर दीं।
आदेश पारित करते समय ट्रायल कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के चार कथित निर्णयों का उल्लेख किया, जिन्हें बाद में याचिकाकर्ताओं ने गैर-मौजूद और फर्जी बताया।
हाइकोर्ट ने इस आपत्ति की जांच की और पाया कि जिन निर्णयों का हवाला दिया गया, वे कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा उत्पन्न थे। हालांकि चेतावनी देते हुए हाइकोर्ट ने मामले का गुण-दोष के आधार पर निस्तारण कर दिया और पुनर्विचार याचिका खारिज की।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला विवाद के गुण-दोष से अधिक न्यायनिर्णयन की प्रक्रिया से जुड़ी गंभीर संस्थागत चिंता उठाता है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि वह ट्रायल कोर्ट द्वारा AI-निर्मित, गैर-मौजूद या कृत्रिम निर्णयों के उपयोग के परिणामों और जवाबदेही की जांच करेगी।
मामले के व्यापक प्रभाव को देखते हुए पीठ ने भारत के एडवोकेट जनरल, सॉलिसिटर जनरल और बार काउंसिल ऑफ इंडिया को नोटिस जारी किया।
साथ ही सीनियर एडवोकेट श्याम दीवान को न्यायमित्र नियुक्त करते हुए उन्हें सहयोग के लिए अभिलेख अधिवक्ता नामित करने की अनुमति दी गई।
गौरतलब है कि हाल के समय में सुप्रीम कोर्ट ने अधिवक्ताओं द्वारा AI से उत्पन्न फर्जी मामलों का हवाला दिए जाने पर भी चिंता व्यक्त की थी।
अदालत ने संकेत दिया कि नई प्रौद्योगिकी का उपयोग सावधानी और सत्यापन के साथ ही किया जाना चाहिए अन्यथा इससे न्यायिक प्रणाली की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।

