लंबे समय तक चलने वाले सेवा विवाद नियुक्तियों में बाधा बन रहे हैं: सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक आत्ममंथन की जरूरत बताई

Amir Ahmad

16 Jan 2026 12:27 PM IST

  • लंबे समय तक चलने वाले सेवा विवाद नियुक्तियों में बाधा बन रहे हैं: सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक आत्ममंथन की जरूरत बताई

    सुप्रीम कोर्ट ने सेवा मामलों से जुड़ी लंबी और बार-बार होने वाली मुकदमेबाजी पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि इस तरह के विवाद सार्वजनिक भर्ती प्रक्रियाओं को “लगातार अनिश्चितता” की स्थिति में धकेल रहे हैं।

    अदालत ने कहा कि न्यायालयों को सेवा नियमों की व्याख्या इस तरह करनी चाहिए, जिससे चयन प्रक्रिया समयबद्ध तरीके से पूरी हो सके और योग्य उम्मीदवारों की नियुक्ति में अनावश्यक देरी न हो।

    यह टिप्पणी जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने 15 जनवरी को दिए गए फैसले में की।

    अदालत ने कहा कि अपने साझा अनुभव के आधार पर यह स्पष्ट है कि देशभर में बड़ी संख्या में सेवा से जुड़े विवाद लंबे समय तक खिंचते रहते हैं, जिससे उम्मीदवार वर्षों तक असमंजस में फंसे रहते हैं। न्यायपालिका को इन व्यावहारिक वास्तविकताओं के प्रति सजग रहना चाहिए और ऐसे निर्णयों से बचना चाहिए, जो चयन प्रक्रियाओं को अंतिम रूप तक पहुंचने से रोक दें।

    सुप्रीम कोर्ट ने ये टिप्पणियां राजस्थान लोक सेवा आयोग द्वारा दायर तीन सिविल अपीलों को स्वीकार करते हुए कीं। इन अपीलों में राजस्थान हाइकोर्ट के उन आदेशों को चुनौती दी गई थी, जिनमें समाप्त हो चुकी प्रतीक्षा या आरक्षित सूची से उम्मीदवारों की नियुक्ति या विचार का निर्देश दिया गया।

    मामले की पृष्ठभूमि

    राजस्थान लोक सेवा आयोग ने कनिष्ठ विधि अधिकारी और सहायक सांख्यिकी अधिकारी पदों के लिए अलग-अलग भर्ती प्रक्रियाएं आयोजित की थीं। चयन सूची पर कार्रवाई के बाद कुछ चयनित उम्मीदवारों ने नियुक्ति ग्रहण नहीं की। इसके बाद प्रतीक्षा सूची में शामिल उम्मीदवारों ने राजस्थान हाइकोर्ट का रुख किया और रिक्त पदों पर नियुक्ति की मांग की।

    हाइकोर्ट के एकल जजों ने याचिकाएं स्वीकार करते हुए कहा कि चयनित उम्मीदवारों के शामिल न होने पर प्रतीक्षा सूची में शामिल अभ्यर्थियों का अधिकार पुनर्जीवित हो जाता है। बाद में खंडपीठ ने भी आयोग की अपील खारिज कर दी थी।

    सुप्रीम कोर्ट ने इन आदेशों को पलटते हुए कहा कि राजस्थान लोक सेवा आयोग संविधान के अनुच्छेद 315 और 320 के तहत एक संवैधानिक संस्था है और राज्य सरकार द्वारा अपील न करने की स्थिति में भी आयोग को अपील करने का पूरा अधिकार है।

    अदालत ने कहा कि आयोग की सिफारिश के बिना कोई नियुक्ति नहीं हो सकती और प्रतीक्षा सूची से नियुक्ति के निर्देश सीधे तौर पर आयोग के वैधानिक कार्यों को प्रभावित करते हैं।

    मामले के गुण-दोष पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि प्रतीक्षा या आरक्षित सूची भर्ती का स्वतंत्र या स्थायी स्रोत नहीं होती। प्रतीक्षा सूची में शामिल उम्मीदवारों को नियुक्ति का कोई अटल अधिकार नहीं होता और उन्हें केवल नियमों में निर्धारित वैधता अवधि के भीतर ही विचार में लिया जा सकता है।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि संबंधित नियमों के तहत आरक्षित सूची अधिकतम छह महीने तक ही प्रभावी रह सकती है।

    राजस्थान हाइकोर्ट ने इस अवधि की गणना चयनित उम्मीदवारों के नियुक्ति न लेने की तारीख से करके स्पष्ट गलती की, जबकि उन मामलों में आरक्षित सूची पहले ही समाप्त हो चुकी थी।

    सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जिन याचिकाओं के आधार पर हाइकोर्ट ने आदेश दिए, वे स्वयं आरक्षित सूची की वैधता समाप्त होने के बाद दायर की गई थीं। ऐसे में किसी वैध अधिकार के अभाव में नियुक्ति का आदेश नहीं दिया जा सकता था।

    अन्य मामलों के आधार पर समानता के दावे को भी अदालत ने खारिज करते हुए कहा कि संविधान का अनुच्छेद 14 “नकारात्मक समानता” को मान्यता नहीं देता और किसी अवैध कार्रवाई को यह कहकर जारी नहीं रखा जा सकता कि ऐसा अन्य मामलों में भी हुआ है।

    अंततः सुप्रीम कोर्ट ने तीनों अपीलों को स्वीकार करते हुए राजस्थान हाइकोर्ट के एकल जज और खंडपीठ दोनों के आदेशों को रद्द कर दिया।

    अदालत ने उम्मीदवारों के प्रति सहानुभूति व्यक्त की, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि वैधानिक भर्ती नियमों के विपरीत की गई नियुक्तियों को कायम नहीं रखा जा सकता।

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