सुप्रीम कोर्ट ने केवल पत्नी को मिले तलाक के विशेष अधिकार को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की
Amir Ahmad
11 May 2026 3:31 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को वह जनहित याचिका खारिज की, जिसमें हिंदू विवाह अधिनियम की ऐसी धारा को चुनौती दी गई, जो केवल पत्नी को तलाक मांगने का विशेष अधिकार देती है।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(2)(iii) को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
यह प्रावधान पत्नी को यह अधिकार देता है कि यदि पति के खिलाफ भरण-पोषण का आदेश पारित होने के बाद एक वर्ष या उससे अधिक समय तक साथ रहना दोबारा शुरू नहीं होता तो वह तलाक की मांग कर सकती है।
याचिकाकर्ता ने स्वयं अदालत में पेश होकर कहा कि यह अधिकार पुरुषों और महिलाओं दोनों को समान रूप से मिलना चाहिए।
उसने अदालत से कहा,
“मैं इस प्रावधान पर पुनर्विचार चाहता हूं।”
इस पर चीफ जस्टिस ने पूछा,
“इससे आपको क्या समस्या है?”
याचिकाकर्ता ने जवाब दिया,
“यह अधिकार पुरुष और महिला दोनों के लिए खुला होना चाहिए।”
चीफ जस्टिस ने फिर कहा,
“आपको इससे क्या परेशानी हो रही है?”
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी पूछा कि क्या याचिकाकर्ता स्वयंभू पुरुष अधिकार नेता है।
जब याचिकाकर्ता ने बताया कि वह वैवाहिक विवाद से गुजर रहा है और व्यक्तिगत रूप से प्रभावित है, तब चीफ जस्टिस ने कहा,
“यही बात हम आपसे स्वीकार करवाना चाहते थे। आप पर भारी लागत क्यों न लगाई जाए?”
जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 15(3) के तहत संरक्षित है, जो महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान बनाने की अनुमति देता है।
उन्होंने कहा,
“यदि आपको आपत्ति है तो संविधान में संशोधन कराइए। यह महिलाओं के लिए विशेष कानून है।”
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह भी चेतावनी दी कि व्यक्तिगत विवादों के समाधान के लिए संविधान के अनुच्छेद 32 का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
चीफ जस्टिस ने कहा,
“व्यक्तिगत बदले की भावना निकालने के लिए अनुच्छेद 32 का इस्तेमाल मत कीजिए।”
अदालत को यह भी बताया गया कि याचिकाकर्ता कानून की पढ़ाई कर रहा है।
इस पर चीफ जस्टिस ने कहा,
“हो सकता है आपकी कुछ वास्तविक शिकायतें हों। हमें आपके प्रति सहानुभूति है, लेकिन आपकी अलग रह रही पत्नी के प्रति भी सहानुभूति है। लॉ स्टूडेंट के तौर पर यह अच्छा संदेश नहीं देता।”
इन्हीं टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने जनहित याचिका खारिज की।

