बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री हटाने के लिए राष्ट्रीय डेटाबेस बनाए केंद्र सरकार: सुप्रीम कोर्ट, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जवाबदेही तय करने के निर्देश
Amir Ahmad
17 Oct 2026 1:30 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट पर बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी सामग्री (CSEAM) का पता लगाने और उसे हटाने के लिए तकनीकी और नियामक व्यवस्था मजबूत करने का निर्देश दिया।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने केंद्र सरकार को ऐसी सामग्री की पहचान करने और उसे विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से हटाने में मदद के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय डेटाबेस बनाने को कहा है।
अदालत ने यह निर्देश ऐसे समय दिया, जब 2024 में जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस एवं अन्य बनाम एस. हरिश एवं अन्य मामले में निर्देश जारी किए जाने के बावजूद इंटरनेट पर ऐसी सामग्री के प्रसार को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था काफी हद तक इस प्रक्रिया पर निर्भर है कि किसी प्लेटफॉर्म पर हानिकारक सामग्री की शिकायत की जाए और फिर उसे वहां से हटाया जाए। अलग-अलग प्लेटफॉर्म के बीच पर्याप्त समन्वय नहीं होने के कारण एक मंच पर सामग्री हटाए जाने के बाद भी वही सामग्री दूसरे मंचों पर उपलब्ध रह सकती है।
अदालत के अनुसार जब एक प्लेटफॉर्म ऐसी सामग्री की पहचान कर उसे हटाता है, तो दूसरे प्लेटफॉर्म पर उसकी स्वतः पहचान नहीं हो पाती और न ही उसे अपने आप हटाया जाता है। इस बिखरी हुई व्यवस्था के कारण सामग्री को पूरी तरह हटाने में देरी होती है और उसका प्रसार जारी रह सकता है।
पीठ ने कहा कि नियामक प्राधिकरणों और सोशल मीडिया मध्यस्थों की ओर से प्रभावी पहल की कमी के कारण बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षित रखने के लिए हस्तक्षेप करना जरूरी हो गया।
अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह ऐसी सामग्री की पुष्टि किए गए डिजिटल हैश और यूआरएल वाला एक व्यापक राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करे। यह डेटाबेस मौजूदा सहयोग पोर्टल के भीतर बनाया जा सकता है या इसके लिए एक अलग व्यवस्था स्थापित की जा सकती है। हैश किसी तस्वीर या वीडियो की विशिष्ट डिजिटल पहचान होती है, जिसके माध्यम से प्लेटफॉर्म यह पता लगा सकते हैं कि वही सामग्री किसी दूसरे यूजर ने दोबारा अपलोड की है या नहीं। वहीं, यूआरएल उन इंटरनेट पतों की पहचान करता है, जहां ऐसी सामग्री उपलब्ध है, ताकि उन स्रोतों तक पहुंच रोकी जा सके।
पीठ ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय डेटाबेस में केवल पुष्टि की गई CSEAM सामग्री के डिजिटल हैश और यूआरएल शामिल किए जाएं न कि ऐसी सामग्री की तस्वीरें या वीडियो स्वयं रखे जाएं।
अदालत के अनुसार, इस साझा डेटाबेस से सोशल मीडिया मध्यस्थ अपने-अपने प्लेटफॉर्म पर सामग्री की पहचान करने के साथ-साथ केंद्रीय रिकॉर्ड से उसका मिलान भी कर सकेंगे। इससे एक ही सामग्री को अलग-अलग मंचों पर बार-बार पहचानने और हटाने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने डेटाबेस में दर्ज प्रत्येक प्रविष्टि की कई स्तरों पर जांच करने का भी निर्देश दिया। शुरुआती छंटाई के लिए विशेष सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन अंतिम आकलन कम से कम तीन प्रशिक्षित मानव विश्लेषकों द्वारा स्वतंत्र रूप से किया जाना चाहिए। प्रत्येक विश्लेषक को अलग-अलग यह निर्धारित करना होगा कि संबंधित सामग्री CSEAM की श्रेणी में आती है या नहीं।
अदालत ने कहा कि गलत पहचान के कारण वैध सामग्री हटाए जाने से रोकने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय जरूरी हैं। इसके लिए जांच और आकलन का रिकॉर्ड रखना, डेटाबेस तक पहुंच का लॉग तैयार करना, समय-समय पर स्वतंत्र ऑडिट कराना और गलत प्रविष्टियों को तुरंत हटाना शामिल है।
अदालत ने डेटाबेस में दर्ज किसी प्रविष्टि के आधार पर सामग्री हटाए जाने से असंतुष्ट व्यक्तियों के लिए प्रभावी शिकायत निवारण व्यवस्था बनाने का भी निर्देश दिया।
पीठ ने स्पष्ट किया कि सोशल मीडिया मध्यस्थ केवल हानिकारक सामग्री हटाकर या विदेशी संगठनों को इसकी सूचना देकर भारतीय कानून के तहत संबंधित अधिकारियों को सूचित करने की अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।
अदालत ने कहा कि यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) 2020 के नियम 11 के अनुसार, परिस्थितियों के आधार पर ऐसी सामग्री की सूचना विशेष किशोर पुलिस इकाई, स्थानीय पुलिस या साइबर अपराध पोर्टल को दी जानी चाहिए।
अदालत ने सूचना देने के लिए समय-सीमा भी निर्धारित की। यदि कोई मध्यस्थ अपनी जांच-पड़ताल के दौरान ऐसी सामग्री हटाता है जिसका स्रोत अज्ञात है तो उसे हटाए जाने के दो घंटे के भीतर इसकी सूचना देनी होगी। यदि सामग्री किसी शिकायत के बाद हटाई जाती है, तो शिकायत के निपटारे के तुरंत बाद और किसी भी स्थिति में उसके निपटारे के दो घंटे के भीतर रिपोर्ट देनी होगी। वहीं राष्ट्रीय डेटाबेस में पहले से दर्ज किसी प्रविष्टि से मिलान होने के कारण हटाई गई सामग्री के मामलों में मध्यस्थों को हर सप्ताह ऐसी कार्रवाई की समेकित रिपोर्ट डेटाबेस का रखरखाव करने वाले प्राधिकरण को सौंपनी होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया कंपनियों को अपनी वेबसाइटों और ऐप पर शिकायत अधिकारियों तथा शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया का विवरण प्रमुखता से प्रदर्शित करने का निर्देश भी दिया। CSEAM से जुड़ी शिकायतों के लिए एक अलग श्रेणी होनी चाहिए, जो उपयोगकर्ताओं को आसानी से उपलब्ध हो।
अदालत ने कहा कि शिकायतों की समीक्षा प्रशिक्षित शिकायत अधिकारियों द्वारा की जाए। स्वचालित तकनीकी उपकरणों का इस्तेमाल केवल शुरुआती छंटाई में सहायता के लिए किया जा सकता है। प्रत्येक शिकायत मिलने के 24 घंटे के भीतर उसकी प्राप्ति की पुष्टि की जानी चाहिए और शिकायतकर्ता को एक संदर्भ संख्या दी जानी चाहिए। शिकायत पर लिए गए निर्णय और उसके कारणों की जानकारी भी संबंधित व्यक्ति को दी जानी चाहिए।
पीठ ने केंद्र सरकार से सूचना प्रौद्योगिकी नियमों में उचित संशोधन करके इन जवाबदेही संबंधी आवश्यकताओं को सभी मध्यस्थों पर लागू करने को कहा।
अदालत ने उन प्लेटफॉर्म के खिलाफ कड़ी आर्थिक दंड व्यवस्था बनाने पर भी विचार करने को कहा, जो सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और उससे जुड़े नियमों के तहत अपनी जिम्मेदारियों का पालन नहीं करते।
पीठ ने कहा कि दंड की राशि तय करते समय उल्लंघन की गंभीरता, उसकी अवधि, बार-बार नियम तोड़ने की स्थिति और संबंधित मध्यस्थ के आकार तथा कारोबार को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने भुगतान के बाद उपलब्ध होने वाली सामग्री और सदस्यता आधारित सेवाओं की भी सख्त जांच करने की आवश्यकता बताई, ताकि ऐसी सेवाओं के माध्यम से बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री या अन्य प्रतिबंधित सामग्री को होस्ट, प्रचारित या प्रसारित न किया जा सके।
अदालत ने केंद्र सरकार से इस तरह की सामग्री की जांच के लिए दिशा-निर्देश बनाने और यह विचार करने को कहा कि क्या पेवॉल या सदस्यता के जरिए CSEAM के प्रसार से मध्यस्थों को हुई कमाई जब्त करके वापस ली जानी चाहिए।
पीठ ने कहा कि बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षित रखने के लिए केवल तकनीकी सुरक्षा उपाय पर्याप्त नहीं हैं। बच्चों को ऐसे खतरों को पहचानने, दुर्व्यवहार की रिपोर्ट करने और इंटरनेट पर सुरक्षित व्यवहार अपनाने के बारे में जागरूक करना भी जरूरी है।
अदालत ने बच्चों की उम्र के अनुरूप सहमति, सुरक्षित और असुरक्षित स्पर्श, स्वस्थ संबंधों, व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा, ऑनलाइन शोषण और दुर्व्यवहार की शिकायत करने के तरीकों से जुड़ी शिक्षा देने की आवश्यकता पर जोर दिया।
अदालत ने सुझाव दिया कि डिजिटल सुरक्षा और उम्र के अनुरूप यौन शिक्षा को स्कूलों के मूल पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए। इसके लिए राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) तथा राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषदों (SCERT) को बाल मनोवैज्ञानिकों, शिक्षकों और अभिभावक विशेषज्ञों के परामर्श से पाठ्य सामग्री विकसित करनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और कानून एवं न्याय मंत्रालय के माध्यम से आदेश में बताए गए उपायों और सुरक्षा व्यवस्थाओं को लागू करने के लिए उचित कदम उठाने का निर्देश दिया। इसमें जरूरी दिशा-निर्देश और मानक संचालन प्रक्रियाएं तैयार करना तथा आवश्यकता के अनुसार सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और उससे जुड़े नियमों में संशोधन करना भी शामिल है।
अदालत ने केंद्र सरकार से अगली सुनवाई, 10 दिसंबर 2026 तक, निर्देशों को लागू करने की दिशा में हुई प्रगति का विवरण देते हुए हलफनामा दाखिल करने को कहा।

