POCSO के तहत आंशिक प्रवेश ही पर्याप्त: सिक्किम हाईकोर्ट ने 5 साल की बच्ची से यौन शोषण के दोषी 60 वर्षीय व्यक्ति की सजा बरकरार रखी
Amir Ahmad
27 April 2026 12:36 PM IST

सिक्किम हाईकोर्ट ने पांच साल की मासूम बच्ची के साथ 'गंभीर पैठ वाले यौन हमले के दोषी 60 वर्षीय व्यक्ति की सजा बरकरार रखी। अदालत ने स्पष्ट किया कि POCSO Act के तहत अपराध सिद्ध होने के लिए पूर्ण प्रवेश आवश्यक नहीं है बल्कि शरीर के किसी हिस्से या वस्तु का आंशिक प्रवेश भी पर्याप्त है।
जस्टिस मीनाक्षी मदन राय और जस्टिस भास्कर राज की खंडपीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा,
"प्रथम दृष्टया यह पाया गया कि लगभग साठ वर्ष की आयु के अपीलकर्ता ने नाबालिग पीड़िता पर गंभीर पैठ वाले यौन हमले का अपराध किया। अतः ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा बरकरार रखा जाती है।"
पूरा मामला
यह मामला 5 सितंबर, 2020 को दर्ज की गई FIR से शुरू हुआ, जिसमें आरोप लगाया गया कि आरोपी ने अपनी पांच साल की भतीजी का उसके घर के पास यौन शोषण किया। मामले की जांच के बाद ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को POCSO Act की धारा 3(b) और 5(m) के तहत दोषी ठहराते हुए 20 साल के कारावास की सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट के समक्ष अपीलकर्ता ने घटना या बच्ची की उम्र पर सवाल नहीं उठाया। उसका मुख्य तर्क यह था कि यह कृत्य पैठ वाले यौन हमले की श्रेणी में नहीं आता, इसलिए उसे कम सजा दी जानी चाहिए।
अदालत ने बच्ची की गवाही का मूल्यांकन करते हुए पाया कि उसका बयान स्पष्ट और सुसंगत था। बच्ची ने बताया कि आरोपी ने उसके निजी अंगों में उंगली डाली थी, जिससे उसे काफी दर्द हुआ। अदालत ने माना कि इतनी कम उम्र के बावजूद बच्ची की गवाही भरोसेमंद है और क्रॉस-एग्जामिनेशन के दौरान भी वह अपने बयान पर अडिग रही।
अदालत को एक चश्मदीद गवाह के बयानों में भी मज़बूत समर्थन मिला, जिसने आरोपी को बच्ची के साथ गलत हरकत करते हुए सीधे देखा था। इसके अलावा, मेडिकल रिपोर्ट में डॉक्टर ने बच्ची के निजी अंगों पर ताजी चोटों और खरोंच के निशान नोट किए थे जिससे यौन हिंसा की पुष्टि हुई।
अदालत ने POCSO Act की धारा 3(b) की व्याख्या करते हुए दोहराया:
1. पैठ वाले यौन हमले का अर्थ है किसी वस्तु या शरीर के अंग को किसी भी हद तक प्रवेश कराना।
2. इसके लिए पूर्ण प्रवेश की आवश्यकता नहीं होती है।
3. चूंकि पीड़िता की उम्र बारह वर्ष से कम है, इसलिए यह अपराध 'गंभीर पैठ वाले यौन हमले' (धारा 5-m) के दायरे में आता है।
इन तथ्यों और सबूतों के आधार पर हाईकोर्ट ने दोषी की 20 साल की सजा और जुर्माने को सही ठहराते हुए याचिका खारिज की।

