'क्या भगवान इससे खुश होंगे?' महावीर जी मंदिर विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने जैन संप्रदायों से कहा- आपस में लड़कर भगवान को क्यों परेशान कर रहे हैं?
Amir Ahmad
9 Sept 2026 5:21 PM IST

राजस्थान के महावीर जी जैन मंदिर के प्रबंधन को लेकर श्वेतांबर और दिगंबर जैन संप्रदायों के बीच चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को दोनों पक्षों को धार्मिक भावनाओं से जुड़े इस मामले में संयम बरतने की सलाह दी।
कोर्ट ने कहा कि जिस भगवान के नाम पर दोनों पक्ष मुकदमा लड़ रहे हैं क्या वह इस तरह की कानूनी लड़ाई से खुश होंगे?
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने मामले में आदेश सुरक्षित रख लिया। पीठ ने दोनों पक्षों को आठ दिन के भीतर लिखित दलीलें दाखिल करने का निर्देश दिया।
याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट आर्यमा सुंदरम और प्रतिवादी की ओर से सीनियर एडवोकेट श्याम दीवान पेश हुए।
सुनवाई के दौरान जस्टिस पारदीवाला ने धार्मिक संवेदनशीलता को देखते हुए दोनों पक्षों से सावधानी बरतने को कहा।
उन्होंने पूछा कि क्या ऐसा संभव है कि सुबह श्वेतांबर संप्रदाय अपनी परंपरा के अनुसार भगवान की पूजा करे और शाम को दिगंबर संप्रदाय भगवान के वस्त्र बदलकर अपने तरीके से पूजा करे।
जस्टिस पारदीवाला ने कहा,
“आप महान भगवान को क्यों परेशान कर रहे हैं? यह अनावश्यक मुकदमा क्यों? क्या आपको लगता है कि भगवान इससे खुश होंगे?”
उन्होंने कहा कि मामला धार्मिक भावनाओं से जुड़ा बेहद संवेदनशील विषय है और किसी भी पक्ष की भावनाओं को ठेस पहुंचाए बिना विवाद को संभालने की जरूरत है।
विवाद की कानूनी जड़ राजस्थान लोक न्यास अधिनियम, 1959 के तहत शुरू हुई कार्यवाही में है। मंदिर के प्रबंधन से दिगंबर समिति के अध्यक्ष और सचिव को हटाने तथा श्वेतांबर संप्रदाय की नई प्रबंधन समिति गठित करने की मांग की गई।
यह आवेदन मंदिर के प्रबंधन और प्रशासन को लेकर दिगंबर समिति के खिलाफ की गई पूर्व कार्यवाही के बाद दाखिल हुआ।
मामले में 1970 में उपखंड अधिकारी ने दिगंबर समिति के खिलाफ आवेदन को मंजूर किया।
बाद में अक्टूबर 1994 में ट्रायल कोर्ट ने कार्यवाही को समाप्त मानते हुए रोक दिया। यह कदम दिगंबर समिति की ओर से पूजा स्थल अधिनियम, 1991 की धारा 4 के तहत दाखिल आवेदन के बाद उठाया गया।
इसके बाद राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर की गई। दिगंबर समिति ने इस आधार पर अपील का विरोध किया कि 1991 के अधिनियम के तहत कार्यवाही समाप्त हो चुकी थी।
हालांकि, हाईकोर्ट ने माना कि 1959 के अधिनियम की धारा 40 के तहत पारित आदेश डिक्री की प्रकृति का है और उसके खिलाफ वैधानिक अपील की जा सकती है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि 1991 के अधिनियम के तहत कार्यवाही समाप्त हो जाने से पीड़ित पक्ष का अपील का वैधानिक अधिकार खत्म नहीं होता।
इसी आदेश को दिगंबर समिति ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
सुनवाई के दौरान श्याम दीवान ने कहा कि मंदिर के पूजा स्थल को बदलने या उसका स्वरूप परिवर्तित करने की कोई मांग नहीं है। इसलिए पूजा स्थल अधिनियम, 1991 लागू नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि विवाद केवल मंदिर के प्रबंधन से जुड़ा है और इसका उद्देश्य पूरे जैन समुदाय के हित में मंदिर का संचालन सुनिश्चित करना है।
इसके जवाब में आर्यमा सुंदरम ने कहा कि हाईकोर्ट को अपील पर सुनवाई ही नहीं करनी चाहिए। उनके मुताबिक, 1991 के अधिनियम के तहत कार्यवाही समाप्त किए जाने के आदेश के खिलाफ वैधानिक अपील का प्रावधान नहीं है और ऐसी स्थिति में हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की जानी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि मंदिर और उससे जुड़ी संपत्तियों के प्रबंधन और कब्जे को लेकर दिगंबर संप्रदाय की स्थिति पहले से स्वीकार की गई।
सुंदरम ने कहा,
“धर्म संवेदनशील विषय है और इसी वजह से 1991 का अधिनियम बनाया गया।”
जस्टिस पारदीवाला ने स्पष्ट किया कि पीठ फिलहाल किसी अन्य विवाद में नहीं जाएगी और प्रतिवादी को यह बताना होगा कि पूजा स्थल अधिनियम की धारा 4 की रोक इस मामले में क्यों लागू नहीं होती।
श्याम दीवान ने जवाब दिया कि इस सवाल का फैसला साक्ष्यों के आधार पर ही किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर सवाल तय किए जा सकते हैं और दोनों पक्षों को साक्ष्य पेश करने का अवसर मिलना चाहिए।
उन्होंने दोहराया कि उनका पक्ष मंदिर के स्वरूप या पूजा पद्धति में बदलाव नहीं चाहता, बल्कि केवल प्रबंधन को लेकर चिंतित है।
इस पर जस्टिस पारदीवाला ने एक अहम सवाल किया। उन्होंने पूछा कि यदि भविष्य में दिगंबर पक्ष को मंदिर का प्रबंधन मिल जाता है, तो क्या वह यह लिखित आश्वासन देगा कि पूजा की परंपराओं और रीति-रिवाजों में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा।
दीवान ने जवाब दिया कि धर्म प्रत्येक व्यक्ति के लिए निजी विषय है और अलग-अलग संप्रदायों में पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों का तरीका अलग हो सकता है।
इसके बाद पीठ ने मामले में आदेश सुरक्षित रख लिया और दोनों पक्षों को आठ दिन के भीतर अपनी लिखित दलीलें दाखिल करने का निर्देश दिया।


