शराब पीने और सहकर्मियों से दुर्व्यवहार पर CRPF जवान की बर्खास्तगी 'मनमानी': राजस्थान हाईकोर्ट

  • शराब पीने और सहकर्मियों से दुर्व्यवहार पर CRPF जवान की बर्खास्तगी मनमानी: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने ड्यूटी के दौरान शराब पीने और सहकर्मियों से दुर्व्यवहार के आरोप में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के धोबी कर्मचारी को बर्खास्त करने के आदेश को उसके कथित कदाचार की तुलना में बेहद असंगत बताया। कोर्ट ने कहा कि यह कार्रवाई केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल अधिनियम, 1949 के प्रावधानों के भी विपरीत है।

    जस्टिस अशोक कुमार जैन ने कहा कि जब कर्मचारी पर कम गंभीर अपराध का आरोप था तो यह कैसे माना जा सकता है कि उसे ऐसी सजा दी जाए जिससे उसकी नौकरी ही चली जाए। कोर्ट ने कहा कि सेवा से बर्खास्तगी या हटाना बड़ी सजा है और इसे केवल गंभीर कदाचार के मामलों में ही दिया जाना चाहिए।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि कर्मचारी को बर्खास्त करने से पहले अपना बचाव पेश करने का उचित अवसर नहीं दिया गया। अनुशासित बल का हिस्सा होने का मतलब यह नहीं है कि किसी कर्मचारी को निष्पक्ष सुनवाई या अनुशासनात्मक कार्यवाही में अपना पक्ष रखने के अधिकार से वंचित किया जा सकता है।

    हाईकोर्ट ने अधिकारियों की कार्रवाई को जल्दबाजी में की गई और मनमानी बताते हुए इसे शक्तियों का गंभीर दुरुपयोग माना। कोर्ट ने बर्खास्तगी का आदेश रद्द कर दिया और कर्मचारी को सेवा में बहाल करने के साथ उससे जुड़े परिणामी लाभ देने का निर्देश दिया।

    मामले के अनुसार याचिकाकर्ता CRPF में धोबी के पद पर कार्यरत था। उसके खिलाफ शिकायत की गई कि उसने ड्यूटी के दौरान शराब पी और सहकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार किया। उसे केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल अधिनियम की धारा 10(n) के तहत दोषी पाया गया और क्वार्टर गार्ड में 10 दिन के साधारण कारावास की सजा दी गई।

    कारावास के दौरान ही उसे कारण बताओ नोटिस जारी किया गया और अगले ही दिन तक जवाब देने को कहा गया। हिरासत में होने के कारण वह जवाब दाखिल नहीं कर सका। इसके बाद उसे निलंबित कर दिया गया और अंततः सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। इसी कार्रवाई को चुनौती देते हुए उसने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

    याचिकाकर्ता ने दलील दी कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ, क्योंकि उसे न तो गवाहों के बयान उपलब्ध कराए गए और न ही सुनवाई का अवसर दिया गया। उसने यह भी कहा कि संबंधित मेडिकल रिपोर्ट में शराब के सेवन का कोई संकेत नहीं था और कथित कदाचार की तुलना में बर्खास्तगी की सजा अत्यधिक कठोर थी।

    दलीलों पर विचार करते हुए कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी को अपेक्षाकृत कम गंभीर अपराध में दोषी ठहराए जाने के बावजूद इतनी कठोर सजा देना अधिनियम के प्रावधानों के विपरीत है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि सेवा से बर्खास्तगी का अर्थ किसी व्यक्ति की आर्थिक मृत्यु के समान है।

    हाईकोर्ट ने घटनाक्रम की समय-सीमा पर भी गौर किया। कोर्ट ने कहा कि कमांडेंट ने पूरी प्रक्रिया जल्दबाजी में पूरी की और ऐसा प्रतीत होता है कि कर्मचारी को सुनवाई का पर्याप्त अवसर दिए बिना ही सेवा से हटाने की जल्दी थी। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि मेडिकल रिपोर्ट अधिकारियों के आरोपों का समर्थन नहीं करती थी।

    फैसले में कहा गया कि पूरे घटनाक्रम और उपलब्ध सामग्री से स्पष्ट है कि कर्मचारी को अपना बचाव करने का उचित अवसर दिए बिना बर्खास्तगी का आदेश पारित किया गया। नोटिस दिए जाने के समय कर्मचारी हिरासत में था और उसका जवाब दाखिल नहीं हुआ। कोर्ट के अनुसार, यह परिस्थिति दर्शाती है कि उसे सुनवाई का वास्तविक अवसर नहीं दिया गया।

    इन परिस्थितियों में राजस्थान हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी का आदेश रद्द करते हुए कर्मचारी को सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया।

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