केस डायरी पेश न कर पाना हमेशा अपराध नहीं, जानबूझकर चूक साबित होना जरूरी: राजस्थान हाईकोर्ट

Amir Ahmad

27 July 2026 12:31 PM IST

  • केस डायरी पेश न कर पाना हमेशा अपराध नहीं, जानबूझकर चूक साबित होना जरूरी: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने थाना प्रभारी (SHO) के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 175 के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द करते हुए कहा है कि यदि सरकारी वकील से सूचना नहीं मिलने के कारण केस डायरी अदालत में पेश नहीं हो सकी, तो इसे अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 175 के तहत अपराध तभी बनता है, जब दस्तावेज जानबूझकर प्रस्तुत न किया गया हो।

    जस्टिस अनूप कुमार ढांड की सिंगल बेंच ने कहा कि धारा 175 के तहत कार्रवाई के लिए दोषपूर्ण मंशा (मेंस रिया) का होना आवश्यक है। यदि पुलिस अधिकारियों की हर वास्तविक और अनजाने में हुई चूक को जानबूझकर किया गया कृत्य मान लिया जाए, तो "ऐसी शिकायतों की बाढ़ आ जाएगी।"

    हालांकि कोर्ट ने यह भी माना कि पुलिस अधिकारियों द्वारा अदालत के आदेशों का पालन न करना न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर समस्या है और इसका प्रभावी समाधान आवश्यक है।

    कोर्ट ने कहा,

    "देशभर में पुलिस अधिकारियों द्वारा समन तामील न करना, वारंट का पालन न करना और दस्तावेज प्रस्तुत न करना जैसी समस्याएं न्यायिक व्यवस्था को प्रभावित कर रही हैं, जिससे बड़ी संख्या में मामलों की सुनवाई लंबित पड़ी रहती है।"

    मामले में संबंधित SHO के कार्यकाल के दौरान ट्रायल कोर्ट ने आपराधिक मुकदमे में कई बार केस डायरी तलब की थी। केस डायरी समय पर प्रस्तुत नहीं होने पर अदालत ने SHO को धारा 175 के तहत नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा।

    SHO ने जवाब में कहा कि उन्हें सरकारी वकील की ओर से केस डायरी पेश करने संबंधी कोई सूचना या पत्र प्राप्त ही नहीं हुआ। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने उनके खिलाफ संज्ञान लिया, जिसे रिवीजन कोर्ट ने भी बरकरार रखा। इसके बाद SHO ने हाईकोर्ट का रुख किया।

    रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि ऐसा कोई प्रथम दृष्टया साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि SHO ने जानबूझकर केस डायरी पेश नहीं की।

    कोर्ट ने कहा कि धारा 175 के तहत कार्रवाई करने से पहले संबंधित अधिकारी को दस्तावेज प्रस्तुत करने का उचित अवसर देना आवश्यक है। यदि अवसर मिलने के बाद भी वह बिना किसी उचित कारण के दस्तावेज प्रस्तुत नहीं करता, तभी उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि समन या सूचना मिलने के बावजूद SHO या जांच अधिकारी जानबूझकर अदालत के आदेश का पालन नहीं करते हैं, तो उनके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।

    इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने SHO के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही और निचली अदालतों के आदेशों को रद्द करते हुए उन्हें राहत प्रदान की।

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