राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा- गवाहों के बयानों में मामूली विरोधाभास के आधार पर पूरे अभियोजन पक्ष को खारिज नहीं किया जा सकता
LiveLaw Network
15 Oct 2026 9:15 AM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने लगभग 30 वर्ष पुराने मारपीट के मामले में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए अधीनस्थ अदालत द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के फैसले को आंशिक रूप से पलट दिया। जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने आरोपी मंगलाल को गंभीर चोट पहुंचाने के अपराध में दोषी ठहराया। हालांकि, घटना वर्ष 1996 की होने और लगभग तीन दशक बीत जाने को ध्यान में रखते हुए उसे कारावास की सजा देने के बजाय सदाचार परिवीक्षा का लाभ प्रदान किया। अदालत ने घायल को 50 हजार रुपये मुआवजा देने का भी आदेश दिया।
राज्य बनाम मंगलाल प्रकरण में राज्य सरकार ने उदयपुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा 17 नवंबर 1998 को पारित दोषमुक्ति के फैसले को चुनौती दी थी। अभियोजन के अनुसार, 6 अक्टूबर 1996 को शाम लगभग साढ़े पांच बजे गोपालदास पशुओं को लाने के लिए खेत की ओर गया था। आरोप था कि रास्ते में मंगलाल ने उसे रोककर लाठी, लात और घूंसों से मारपीट की। काफी देर तक गोपालदास के वापस नहीं लौटने पर परिजन और अन्य लोग उसकी तलाश में निकले। उन्हें वह रास्ते में घायल अवस्था में मिला। लक्ष्मीदास की रिपोर्ट पर पुलिस ने जांच शुरू की। घटनास्थल का निरीक्षण किया गया, नक्शा मौका तैयार किया गया, गवाहों के बयान दर्ज किए गए और घायल की चिकित्सकीय तथा एक्स-रे जांच कराई गई। जांच के दौरान कथित तौर पर वारदात में प्रयुक्त लाठी भी बरामद की गई। इसके बाद आरोपी के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 323 और 325 के तहत मुकदमा चलाया गया।
ट्रायल कोर्ट ने गवाहों के बयानों में विरोधाभासों और घटना के संबंध में संदेह के आधार पर आरोपी को दोनों आरोपों से बरी कर दिया था।
गवाहों के बयानों में अंतर को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया
राज्य की ओर से अपील में तर्क दिया गया कि विचारण अदालत ने गवाहों के बयानों में मौजूद छोटे-छोटे अंतर को जरूरत से अधिक महत्व दिया। घायल के बयान, चिकित्सकीय साक्ष्य और जांच से प्राप्त सामग्री को समग्र रूप से देखने के बजाय अलग-अलग करके परखा गया, जिससे अभियोजन के मूल मामले पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
दूसरी ओर, आरोपी की ओर से विचारण अदालत के फैसले का समर्थन करते हुए कहा गया कि गवाहों के बयान घटना के तरीके और घटनास्थल पर उनकी मौजूदगी के संबंध में एक-दूसरे से मेल नहीं खाते थे।
हाईकोर्ट ने साक्ष्यों का स्वतंत्र रूप से पुनर्मूल्यांकन करते हुए माना कि निचली अदालत ने घटना के मूल स्वरूप को प्रभावित नहीं करने वाली विसंगतियों को अत्यधिक महत्व दिया।
मानवीय स्मृति से गणितीय सटीकता की अपेक्षा नहीं की जा सकती
जस्टिस फरजंद अली ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि किसी गवाह से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह वर्षों पुरानी घटना का प्रत्येक विवरण बिल्कुल उसी क्रम और सटीकता से बताए, जिस प्रकार कोई यांत्रिक अभिलेख घटना को दर्ज करता है। समय बीतने के साथ स्मृति प्रभावित होती है और घटनाओं के क्रम, समय, दूरी तथा अन्य छोटे विवरणों में अंतर आना स्वाभाविक है।
अदालत ने कहा कि न्यायालयों को सामान्य विसंगतियों और ऐसे महत्वपूर्ण विरोधाभासों के बीच अंतर करना चाहिए, जो अभियोजन के मूल मामले को ही प्रभावित कर दें। यदि कोई अंतर आरोपी की पहचान, घटना के घटित होने या अपराध में उसकी भागीदारी पर गंभीर संदेह उत्पन्न नहीं करता, तो केवल उसी आधार पर पूरे अभियोजन पक्ष को खारिज करना उचित नहीं है।
उचित संदेह और काल्पनिक संदेह में अंतर जरूरी
निर्णय में अदालत ने स्पष्ट किया कि संदेह का लाभ देने का सिद्धांत आपराधिक न्याय व्यवस्था की महत्वपूर्ण सुरक्षा है, लेकिन इसका आधार वास्तविक और तर्कसंगत संदेह होना चाहिए। केवल किसी संभावित वैकल्पिक स्थिति की कल्पना कर लेने या गवाहों से असाधारण सटीकता की अपेक्षा करने से उचित संदेह पैदा नहीं हो जाता।
अदालत ने कहा कि अभियोजन के साक्ष्यों को समग्र रूप से परखना आवश्यक है। यदि साक्ष्यों में कुछ कमियां हैं, तो यह देखना चाहिए कि क्या वे अपराध के मूल तत्वों को प्रभावित करती हैं अथवा विश्वसनीय साक्ष्य के शेष हिस्से से अपराध सिद्ध होता है।
इस संदर्भ में अदालत ने उच्चतम न्यायालय के चंद्रप्पा बनाम कर्नाटक राज्य, लीला राम बनाम हरियाणा राज्य और काली राम बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य सहित विभिन्न निर्णयों में प्रतिपादित सिद्धांतों का उल्लेख किया।
घायल के बयान और चिकित्सकीय साक्ष्य को मिला महत्व
हाईकोर्ट ने कहा कि गोपालदास स्वयं घायल था और उसके शरीर पर आई चोटों की पुष्टि चिकित्सकीय साक्ष्य से हुई थी। चिकित्सकों ने उसकी चोटों तथा एक्स-रे जांच में सामने आए फ्रैक्चर की पुष्टि की थी। इससे मारपीट की घटना और चोटों की गंभीरता को समर्थन मिला।
अदालत के अनुसार, घायल गवाह की गवाही को विशेष महत्व दिया जाना चाहिए, क्योंकि उसकी घटनास्थल पर मौजूदगी चोटों से पुष्ट होती है। हालांकि, उसकी गवाही भी न्यायिक जांच से परे नहीं है, लेकिन यदि वह महत्वपूर्ण तथ्यों पर विश्वसनीय पाई जाती है, तो अन्य गवाहों के बयानों में मामूली अंतर के कारण उसे स्वतः खारिज नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि लक्ष्मीदास, रामदास और मंगलदास के बयानों में इस बात को लेकर अंतर था कि वे वास्तविक मारपीट के समय मौजूद थे या घटना के तुरंत बाद पहुंचे थे। इन अंतरों की जांच आवश्यक थी, लेकिन उनसे घायल की गवाही और चिकित्सकीय साक्ष्य का महत्व अपने आप समाप्त नहीं हो जाता।
धारा 323 में बरी, धारा 325 में दोषसिद्धि
सभी साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन करने के बाद हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन ने यह संदेह से परे सिद्ध कर दिया कि मंगलाल ने गोपालदास को स्वेच्छा से चोट पहुंचाई और चोटों में गंभीर चोटें भी शामिल थीं।
इसी आधार पर अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 325 के तहत मंगलाल को दोषी ठहराते हुए उसकी दोषमुक्ति का फैसला निरस्त कर दिया। हालांकि, धारा 323 के तहत उसे बरी रखने का निर्णय बरकरार रखा गया।
कारावास के बजाय दो वर्ष की परिवीक्षा और 50 हजार रुपये मुआवजा
अदालत ने घटना के वर्ष 1996 की होने और लगभग 30 वर्ष बीत जाने की परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 की धारा 4 का लाभ दिया। आरोपी को तत्काल कारावास की सजा देने के बजाय दो वर्ष तक सदाचार बनाए रखने और शांति कायम रखने की शर्त पर परिवीक्षा पर छोड़े जाने का निर्देश दिया गया।
इसके अतिरिक्त, अधिनियम की धारा 5 के तहत घायल गोपालदास को तीन महीने के भीतर 50 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया गया। आरोपी को दो वर्ष की अवधि के लिए दो हजार रुपये का शांति बंधपत्र भी प्रस्तुत करना होगा।
अदालत ने निर्देश दिया कि आरोपी चार सप्ताह के भीतर संबंधित निचली अदालत में उपस्थित होकर आवश्यक बंधपत्र की कार्यवाही पूरी करे। परिवीक्षा की शर्तों का उल्लंघन होने पर निचली अदालत कानून के अनुसार कार्रवाई कर सकेगी।
रजाक खान हैदर @ लाइव लॉ नेटवर्क

