गिरफ्तार लोगों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर डालना कानून से बाहर की सजा: राजस्थान हाईकोर्ट

Amir Ahmad

7 May 2026 5:36 PM IST

  • गिरफ्तार लोगों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर डालना कानून से बाहर की सजा: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने पुलिस द्वारा गिरफ्तार लोगों की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर कर सार्वजनिक रूप से अपमानित करने की प्रवृत्ति पर कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने कहा कि यह कानून से बाहर की सजा देने जैसा है और इससे निर्दोष माने जाने के मूल सिद्धांत का उल्लंघन होता है।

    जस्टिस फरजंद अली ने कहा कि पुलिस जांच के नाम पर किसी आरोपी को दोषी घोषित नहीं कर सकती। अदालत ने इसे पुलिस द्वारा मीडिया ट्रायल बताते हुए कहा कि प्रेस कॉन्फ्रेंस, तस्वीरों का प्रसार और गिरफ्तारी के प्रदर्शन जैसी कार्रवाइयों के जरिए आरोपी को अदालत में दोष सिद्ध होने से पहले ही अपराधी की तरह पेश किया जाता है।

    कोर्ट ने कहा,

    “जांच करने की शक्ति का अर्थ दोष तय करने की शक्ति नहीं है। मीडिया में किसी आरोपी को सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करना या उसकी तस्वीरें प्रसारित करना कानून से परे सजा देने जैसा है।”

    मामला उस याचिका से जुड़ा था, जिसमें पुलिस को आरोपियों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर अपलोड और प्रसारित करने से रोकने की मांग की गई।

    याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि गिरफ्तारी के बाद उन्हें अपमानजनक स्थिति में बैठाकर फोटो और वीडियो बनाए गए तथा बाद में इन्हें पुलिस के आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रसारित किया गया। उन्होंने कहा कि इससे संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 22 के तहत मिले उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है।

    अदालत की सहायता कर रहे अधिवक्ताओं ने कहा कि गिरफ्तार व्यक्तियों को सार्वजनिक रूप से घुमाना, कपड़े उतरवाना और तस्वीरें प्रसारित करना न केवल कानून के शासन के खिलाफ है बल्कि यह संस्थागत अपमान और मानसिक प्रताड़ना भी है।

    कोर्ट ने कहा कि डिजिटल माध्यम पर ऐसी तस्वीरों और वीडियो का स्थायी रिकॉर्ड बन जाता है, जिससे व्यक्ति को जीवनभर सामाजिक कलंक झेलना पड़ सकता है भले ही बाद में वह बरी हो जाए।

    मामले की सुनवाई के दौरान जैसलमेर के पुलिस अधीक्षक और जोधपुर के पुलिस आयुक्त ने अदालत में जवाब दाखिल किया। पुलिस ने कहा कि तस्वीरें केवल आधिकारिक उद्देश्य से ली गई थीं और भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए दिशा-निर्देश जारी कर दिए गए।

    हाईकोर्ट ने पुलिस विभाग द्वारा जारी मानक संचालन प्रक्रिया और परिपत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि इनमें सोशल मीडिया ट्रायल रोकने, आरोपियों की तस्वीरें लेने और प्रसारित करने पर रोक लगाने तथा गिरफ्तार व्यक्तियों के साथ मानवीय व्यवहार सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए।

    अदालत ने कहा,

    “पुलिस राज्य की संस्था है और उसे संवैधानिक सीमाओं में रहकर काम करना होगा। वह न्यायपालिका की भूमिका नहीं निभा सकती।”

    कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसी सार्वजनिक बेइज्जती व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा और स्थायी असर डालती है। अदालत के अनुसार हिरासत में ली गई तस्वीरों और वीडियो का डिजिटल प्रसार व्यक्ति के मनोविज्ञान पर ऐसा घाव छोड़ता है जो बाद में निर्दोष साबित होने पर भी खत्म नहीं होता।

    मामले का निपटारा करते हुए हाईकोर्ट ने कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए। अदालत ने कहा कि सभी पुलिस थानों में मानक संचालन प्रक्रिया का सख्ती से पालन किया जाए। किसी भी आरोपी को सार्वजनिक रूप से घुमाने, अपमानित करने या अमानवीय व्यवहार करने पर रोक रहेगी।

    कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि पुलिस द्वारा सोशल मीडिया के जरिए किसी व्यक्ति को सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करना दंड के समान माना जाएगा, जबकि ऐसा दंड देने का अधिकार पुलिस को नहीं है।

    अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि पुलिस थानों, पुलिस विभाग की वेबसाइट और पुलिस महानिदेशक कार्यालय के पोर्टल पर क्या करें और क्या न करें संबंधी दिशा-निर्देश स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किए जाएं ताकि लोगों को उनके अधिकारों की जानकारी मिल सके।

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