सार्वजनिक रिकॉर्ड में उपलब्ध दस्तावेज जुटाने के लिए Order XI का सहारा नहीं, कानून आलसी पक्षकार की मदद नहीं करता: राजस्थान हाईकोर्ट

Amir Ahmad

12 Sept 2026 12:40 PM IST

  • सार्वजनिक रिकॉर्ड में उपलब्ध दस्तावेज जुटाने के लिए Order XI का सहारा नहीं, कानून आलसी पक्षकार की मदद नहीं करता: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के Order XI के नियम 12 और 14 के तहत दस्तावेजों की खोज और पेशी की प्रक्रिया का इस्तेमाल केवल इसलिए नहीं किया जा सकता कि किसी पक्षकार को अपने विरोधी के जरिए सबूत हासिल करना सुविधाजनक लग रहा है। यदि मांगे गए दस्तावेज सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा हैं और संबंधित पक्ष उन्हें कानून के तहत खुद हासिल कर सकता है तो अदालत की प्रक्रिया को सबूत जुटाने का माध्यम नहीं बनाया जा सकता।

    जस्टिस संजीत पुरोहित ने यह टिप्पणी ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करते हुए की, जिसमें याचिकाकर्ता की ओर से कुछ दस्तावेज पेश कराने के लिए दायर आवेदन खारिज कर दिया गया था। याचिकाकर्ता का दावा था कि संबंधित दस्तावेज प्रतिवादी विभाग के कब्जे में हैं।

    हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अदालत की प्रक्रिया का इस्तेमाल ऐसे पक्षकार की मदद के लिए नहीं किया जा सकता, जो उपलब्ध स्रोतों से खुद सबूत हासिल करने के बजाय दूसरे पक्ष के जरिए उसे प्राप्त करना चाहता है। अदालत ने कहा कि Order XI के प्रावधानों को उन बुनियादी तथ्यों के समर्थन में सबूत इकट्ठा करने का माध्यम भी नहीं बनाया जा सकता जिन्हें साबित करने का मूल दायित्व खुद उस पक्षकार पर है।

    मामले की पृष्ठभूमि

    याचिकाकर्ता का कहना था कि उसके स्वामित्व वाली जमीन पर प्रतिवादी विभाग ने एक तालाब के निर्माण की मंजूरी दी थी। बाद में इस तालाब को दूसरी जगह स्थानांतरित कर दिया गया। याचिकाकर्ता ने इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए स्थायी निषेधाज्ञा की मांग की थी।

    याचिकाकर्ता ने दावा किया कि तालाब की मंजूरी से संबंधित आदेश, चक प्लान और सर्वे शीट जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज प्रतिवादी विभाग के पास हैं। इन्हें हासिल करने के लिए उसने CPC के Order XI के नियम 12 और 14 के तहत ट्रायल कोर्ट में आवेदन दाखिल किया था।

    ट्रायल कोर्ट ने यह आवेदन खारिज किया। अदालत ने इस तथ्य को भी ध्यान में रखा कि मुकदमा दाखिल होने के करीब दो महीने बाद दस्तावेज पेश कराने के लिए आवेदन किया गया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया और तर्क दिया कि मांगे गए दस्तावेज मामले के फैसले के लिए बेहद महत्वपूर्ण और प्रासंगिक हैं।

    याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि उसने सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत आवेदन देकर इन दस्तावेजों को हासिल करने की कोशिश की थी लेकिन उसका आवेदन खारिज कर दिया गया। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील पर गौर करते हुए कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई प्रमाण नहीं रखा गया, जिससे यह साबित हो कि आरटीआई आवेदन वास्तव में खारिज किया गया।

    हाईकोर्ट ने कहा कि Order XI के नियम 12 और 14 के तहत दस्तावेजों की खोज और पेशी का अधिकार अदालत के विवेकाधीन क्षेत्र में आता है। इसका उद्देश्य उन परिस्थितियों में न्यायपूर्ण फैसला सुनिश्चित करना है, जहां मामले के निष्पक्ष निपटारे के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज दूसरे पक्ष से मंगाना जरूरी हो। लेकिन जहां दस्तावेज सार्वजनिक हैं और संबंधित पक्ष उन्हें स्वयं कानून के तहत हासिल कर सकता है, वहां इस विवेकाधीन शक्ति का इस्तेमाल और भी सावधानी से किया जाना चाहिए।

    जस्टिस संजीत पुरोहित ने कहा कि Order XI के तहत दस्तावेजों की खोज और पेशी की व्यवस्था निष्पक्ष न्याय में मदद करने के लिए है लेकिन सामान्य तौर पर इसे केवल इसलिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता कि किसी पक्षकार को दूसरे पक्ष के माध्यम से सबूत हासिल करना सुविधाजनक लग रहा है, खासकर तब जब वही सामग्री उसके लिए दूसरे उचित माध्यमों से उपलब्ध हो।

    अदालत ने पाया कि मौजूदा मामले में मांगे गए दस्तावेज प्रतिवादी विभाग के आधिकारिक रिकॉर्ड का हिस्सा होने के कारण सार्वजनिक दस्तावेज हैं। इसलिए इन्हें लागू कानून के तहत सार्वजनिक दस्तावेज हासिल करने की प्रक्रिया के जरिए प्राप्त किया जा सकता था। ऐसे में Order XI के नियम 12 और 14 के तहत आवेदन दाखिल करने का आधार नहीं बनता।

    हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए उसे बरकरार रखा और याचिका खारिज की।

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