पति-पत्नी में सुलह के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने तलाक की डिक्री रद्द कर बहाल किया विवाह

Amir Ahmad

17 Sept 2026 4:00 PM IST

  • पति-पत्नी में सुलह के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने तलाक की डिक्री रद्द कर बहाल किया विवाह

    राजस्थान हाईकोर्ट ने अलग रह रहे पति-पत्नी के बीच तलाक की डिक्री के बाद हुई सुलह को देखते हुए तलाक का फैसला रद्द कर उनका विवाह बहाल किया। कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक विवाद केवल कानूनी दावों का टकराव नहीं होते, बल्कि इनके पीछे मानवीय रिश्ते और परिवार का जीवन जुड़ा होता है। महाभारत का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने कहा कि जब पक्षकार स्वयं मतभेद खत्म कर साथ रहने का रास्ता चुनते हैं तो कानून को जहां तक संभव हो, उस शांति और पुनर्मिलन की राह को आसान बनाना चाहिए।

    जस्टिस उमा शंकर व्यास और जस्टिस समीर जैन की खंडपीठ ने कहा कि बच्चे का हित तब बेहतर तरीके से सुरक्षित होता है, जब माता-पिता के बीच के मतभेद समझ, जिम्मेदारी और आपसी सम्मान में बदल जाएं। केवल वैवाहिक विवाद के कारण ऐसी स्थिति नहीं बननी चाहिए जो पति-पत्नी द्वारा स्वयं सुलह का रास्ता खोज लेने के बाद भी उनके रिश्ते की बहाली में स्थायी बाधा बन जाए।

    कोर्ट ने कहा कि हिंदू परंपरा में विवाह को केवल दो व्यक्तियों के बीच अनुबंध नहीं माना गया, बल्कि इसे एक पवित्र संस्कार माना गया है, जिसमें दो लोग जीवन की यात्रा साथ तय करने का संकल्प लेते हैं। अदालत ने कहा कि सुलह का अर्थ अतीत के सामने समर्पण करना नहीं, बल्कि भविष्य को एक और अवसर देने का सचेत निर्णय है।

    मामला फैमिली कोर्ट द्वारा पारित तलाक की डिक्री के खिलाफ दायर अपील से जुड़ा था। तलाक की डिक्री पारित होने के बाद पति-पत्नी ने आपसी समझ विकसित की और अपने विवादों का समाधान कर लिया। दोनों ने वैवाहिक संबंध बहाल करने और दोबारा साथ परिवार बसाने का निर्णय लिया।

    हाईकोर्ट ने विशेष रूप से उनकी नाबालिग बेटी के कल्याण और भविष्य को ध्यान में रखा। दोनों पक्षों ने बेटी को माता-पिता का प्यार, स्नेह, देखभाल, साथ और भावनात्मक सुरक्षा उपलब्ध कराने के लिए पारिवारिक जीवन को फिर से बनाने की इच्छा जताई।

    खंडपीठ ने कहा कि वैवाहिक संबंध केवल कानूनी बंधन नहीं होता, बल्कि उसके भावनात्मक, सामाजिक और पारिवारिक आयाम भी होते हैं। जहां कानून इसकी अनुमति देता है, वहां अदालत को उन बाद की परिस्थितियों को भी महत्व देना चाहिए, जिनमें पति-पत्नी स्वयं अपने संबंध को बहाल करने की इच्छा व्यक्त करते हैं।

    कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि दोनों के बीच का विवाद मूल रूप से निजी प्रकृति का था और इसमें व्यापक सार्वजनिक हित या किसी तीसरे पक्ष के अधिकार प्रभावित होने का कोई प्रश्न नहीं था।

    खंडपीठ ने कहा कि न्याय करते समय अदालत इस तथ्य से नजर नहीं फेर सकती कि वैवाहिक मुकदमे केवल एक-दूसरे के खिलाफ कानूनी दावों का मामला नहीं होते, बल्कि मानव संबंधों और परिवारों के जीवन से जुड़े होते हैं। जब पक्षकार स्वयं विवाद से निकलकर सुलह का रास्ता खोज लेते हैं तो कानून को, जहां तक संभव हो, संघर्ष को बनाए रखने के बजाय शांति की राह आसान करनी चाहिए।

    हाईकोर्ट ने कहा कि वैवाहिक मामलों में न्याय का उद्देश्य केवल यह तय करना नहीं है कि कानूनी गलती हुई थी या नहीं, बल्कि परिस्थितियां अनुमति दें तो विवाद का न्यायपूर्ण और मानवीय समाधान तलाशना भी है।

    खंडपीठ ने इस सिद्धांत पर भी जोर दिया कि कानून को केवल उस विवाद को ध्यान में रखकर फैसला नहीं करना चाहिए, जो पहले मौजूद था, बल्कि बाद में सामने आई ऐसी परिस्थितियों पर भी विचार करना चाहिए जिनका मांगी गई राहत पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता हो।

    इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट की तलाक की डिक्री रद्द की और पति-पत्नी के बीच हुई सुलह को प्रभावी करते हुए उनका विवाह बहाल किया। इसके साथ ही अपील स्वीकार की गई।

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