बिना रजिस्ट्रेशन के रिलीज डीड को स्टाम्प ड्यूटी भरकर वैध नहीं बनाया जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट

  • बिना रजिस्ट्रेशन के रिलीज डीड को स्टाम्प ड्यूटी भरकर वैध नहीं बनाया जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि किसी दस्तावेज पर बकाया स्टाम्प ड्यूटी जमा करने से उसके पंजीकरण की कमी अपने आप दूर नहीं हो जाती। कोर्ट ने टिप्पणी की कि जिस दस्तावेज को पहले ही पंजीकरण न होने के कारण न्यायिक रूप से अस्वीकार्य घोषित किया जा चुका है, उसे जब्त करने के लिए सिविल कोर्ट पर दबाव डालना निरर्थक अकादमिक प्रक्रिया और कार्यवाही में देरी करने की रणनीति है।

    जस्टिस समीर जैन ने कहा कि अदालत सिविल कार्यवाही में पक्षकारों द्वारा अपनाई जाने वाली देरी की रणनीति पर मूकदर्शक नहीं बनी रह सकती और न ही अपने पर्यवेक्षण अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल कानूनी रूप से अस्वीकार्य दस्तावेजों को फिर से जीवित करने के लिए होने दे सकती है।

    मामले में प्रतिवादी ने बिक्री विलेख रद्द करने, घोषणा, विभाजन और स्थायी निषेधाज्ञा की मांग करते हुए सिविल मुकदमा दाखिल किया था। याचिकाकर्ता ने लिखित जवाब में विवादित संपत्ति पर अपने विशेष स्वामित्व और कब्जे का दावा किया। यह दावा कथित तौर पर प्रतिवादी के पिता द्वारा निष्पादित रिलीज डीड यानी अधिकार त्याग विलेख पर आधारित था।

    प्रतिवादी ने आवेदन दाखिल कर कहा कि रिलीज डीड पंजीकृत नहीं है, इसलिए कानूनन स्वीकार्य नहीं है। सिविल कोर्ट ने यह आवेदन मंजूर कर लिया।

    इसके बाद याचिकाकर्ता ने बकाया स्टाम्प ड्यूटी भरने की पेशकश करते हुए दस्तावेज को जब्त करने की मांग की। सिविल कोर्ट ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि दस्तावेज पहले ही पंजीकरण न होने के कारण अस्वीकार्य घोषित किया जा चुका है, इसलिए उसे जब्ती के लिए भेजना निरर्थक होगा।

    याचिकाकर्ता ने सिविल कोर्ट के इन दोनों आदेशों को हाईकोर्ट में चुनौती दी। उसने दलील दी कि स्टाम्प ड्यूटी का भुगतान न करना ऐसा दोष है, जिसे सुधारा जा सकता है। उसके अनुसार, यदि अपर्याप्त स्टाम्प शुल्क वाला दस्तावेज अदालत के सामने पेश किया जाता है तो उसे जब्त करना अदालत का दायित्व है।

    याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1908 की धारा 49 के परंतुक के तहत बिना पंजीकरण वाले दस्तावेज को सीमित उद्देश्य, यानी सहायक या गौण प्रयोजन के लिए देखा जा सकता है। उसका दावा था कि पर्याप्त स्टाम्प ड्यूटी जमा करने के बाद दस्तावेज का इस्तेमाल कब्जे की प्रकृति और स्थिति दिखाने के लिए किया जा सकता है।

    धारा 49 का परंतुक कुछ सीमित परिस्थितियों में बिना पंजीकरण वाले दस्तावेज को ऐसे गौण लेन-देन साबित करने के लिए स्वीकार करने की अनुमति देता है, जिनके लिए पंजीकरण आवश्यक नहीं है, बशर्ते स्टाम्प ड्यूटी की शर्त पूरी हो।

    इसके विपरीत, प्रतिवादी ने तर्क दिया कि स्टाम्प ड्यूटी जमा करने से पंजीकरण की कमी अपने आप दूर नहीं होती। उसने कहा कि याचिकाकर्ता रिलीज डीड के आधार पर विवादित संपत्ति पर विशेष स्वामित्व और कब्जे का दावा कर रहा है। इसलिए कब्जे की प्रकृति इस मुकदमे का मुख्य विवाद है, न कि कोई गौण प्रयोजन।

    दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के तर्क में मूलभूत त्रुटि है। वह राजस्थान स्टाम्प एक्ट, 1998 और रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1908 के प्रावधानों को एक-दूसरे के साथ मिला रहा है।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपर्याप्त स्टाम्प शुल्क की कमी सुधारी जा सकने वाली अनियमितता हो सकती है, लेकिन अनिवार्य रूप से पंजीकरण योग्य दस्तावेज का पंजीकरण न होना गंभीर और अपूरणीय दोष है। स्टाम्प की कमी दूर करने से ऐसा दस्तावेज फिर से वैध नहीं हो सकता, जिसे पंजीकरण के अभाव में कानून की नजर में अस्वीकार्य माना गया हो।

    हाईकोर्ट ने धारा 49 के परंतुक पर याचिकाकर्ता की निर्भरता को भी गलत माना। इस संबंध में कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले एम/एस पॉल रबर इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि जब कब्जे की प्रकृति और उसका स्वरूप ही पक्षकारों के बीच मुख्य विवाद हो, तो बिना पंजीकरण वाली डीड को गौण प्रयोजन के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

    कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में याचिकाकर्ता रिलीज डीड के आधार पर वादी के खिलाफ विशेष स्वामित्व और कब्जे का दावा कर रहा है। यह पक्षकारों के बीच मुकदमे का मूल विवाद है, कोई गौण पहलू नहीं।

    हाईकोर्ट ने आगे कहा कि दस्तावेज को जब्त कराने के लिए याचिकाकर्ता का आवेदन कार्यवाही को बाधित करने का परेशान करने वाला प्रयास था। यदि वह वास्तव में स्टाम्प ड्यूटी की कमी दूर करना चाहता था, तो कानून के तहत बकाया स्टाम्प ड्यूटी जमा करने का स्वतंत्र विकल्प उसके पास उपलब्ध था।

    कोर्ट ने कहा कि ऐसे दस्तावेज को जब्त करने के लिए सिविल कोर्ट पर बोझ डालना, जिसे पहले ही न्यायिक रूप से अस्वीकार्य घोषित किया जा चुका है, निरर्थक अकादमिक कवायद है। हाईकोर्ट ने 25 फरवरी, 2026 के सिविल कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए कहा कि उसमें पर्यवेक्षण अधिकार क्षेत्र के तहत हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है।

    इस आधार पर हाईकोर्ट ने याचिकाएं खारिज कीं।

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