46 साल की बकाया दिव्यांग पेंशन देने का आदेश, राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा- सरकारी लापरवाही का खामियाजा पूर्व वायुसेना कर्मी नहीं भुगत सकता
Amir Ahmad
23 Jun 2026 12:33 PM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने भारतीय वायुसेना के पूर्व कॉर्पोरल को बड़ी राहत देते हुए सरकार को 46 वर्षों की बकाया दिव्यांग पेंशन चार महीने के भीतर अदा करने का निर्देश दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि सरकारी निष्क्रियता या देरी के कारण किसी पूर्व सैनिक को उसके वैध अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस नुपुर भाटी की खंडपीठ ने सशस्त्र बल अधिकरण के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर यह फैसला सुनाया, जिसमें दिव्यांग पेंशन बहाल तो की गई, लेकिन उसके बकाये का भुगतान केवल वर्ष 2019 से करने का निर्देश दिया गया।
मामले के अनुसार याचिकाकर्ता वर्ष 1979 में वायुसेना से सेवानिवृत्त हुए। सेवा से मुक्त होने के समय मेडिकल बोर्ड ने उन्हें ब्रोंकियल अस्थमा से पीड़ित मानते हुए आजीवन 30 प्रतिशत दिव्यांग घोषित किया। इसके आधार पर उन्हें 1979 से 1980 तक दिव्यांग पेंशन मिली।
हालांकि, वर्ष 1980 में यह कहते हुए पेंशन बंद की गई कि वह पुनर्मूल्यांकन के लिए मेडिकल बोर्ड के समक्ष उपस्थित नहीं हुए। याचिकाकर्ता का कहना था कि उन्हें इस संबंध में कभी कोई सूचना ही नहीं मिली।
बाद में उन्होंने सशस्त्र बल अधिकरण का दरवाजा खटखटाया, जिसके निर्देश पर पुनर्मूल्यांकन मेडिकल बोर्ड गठित किया गया। मेडिकल बोर्ड ने पाया कि याचिकाकर्ता की दिव्यांगता लगातार बनी हुई है और उसमें कोई बदलाव नहीं आया। इसके बावजूद अधिकरण ने पेंशन की बहाली वर्ष 2019 से प्रभावी मानी और बकाये की गणना भी उसी तिथि से करने का आदेश दिया।
हाईकोर्ट ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि जब मेडिकल बोर्ड ने दिव्यांगता को लगातार जारी माना है तो पेंशन बंद किए जाने की वास्तविक तिथि से बकाया राशि देने से इनकार करने का कोई कानूनी आधार नहीं बचता।
अदालत ने अपने आदेश में कहा,
"याचिकाकर्ता, जिनकी वर्तमान आयु 79 वर्ष है, सक्रिय सैन्य सेवा के दौरान से ही ब्रोंकियल अस्थमा से पीड़ित हैं। अपनी किसी गलती के बिना वह चार दशक से अधिक समय तक अपनी वैध दिव्यांग पेंशन से वंचित रहे हैं। दिव्यांग पेंशन का उद्देश्य उन लोगों को सम्मान और सहारा प्रदान करना है जिन्होंने राष्ट्र सेवा के दौरान कष्ट झेले हैं।"
खंडपीठ ने यह भी कहा कि पुनर्मूल्यांकन मेडिकल बोर्ड गठित करने में हुई देरी पूरी तरह से सरकारी तंत्र की जिम्मेदारी थी और इसका नुकसान याचिकाकर्ता को नहीं उठाना चाहिए।
अदालत ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने 31 मई 1990 को ही अपनी दिव्यांग पेंशन बहाल करने के लिए आवेदन दिया, लेकिन अधिकारियों ने उस पर कोई कार्रवाई नहीं की।
सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व फैसले का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि दिव्यांग पेंशन प्राप्त करना एक महत्वपूर्ण अधिकार है और जब यह अधिकार स्थापित हो जाए तो लाभ उसी तिथि से दिया जाना चाहिए, जिस दिन से वह देय हुआ था।
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि पेंशन बंद किए जाने की वास्तविक तिथि से लेकर अब तक की पूरी बकाया राशि चार महीने के भीतर याचिकाकर्ता को अदा की जाए।

