दिव्यांग अभ्यर्थी को MBBS के लिए अयोग्य बताने से पहले बतानी होगी कार्यात्मक कमी: राजस्थान हाईकोर्ट

Amir Ahmad

20 Aug 2026 1:35 PM IST

  • दिव्यांग अभ्यर्थी को MBBS के लिए अयोग्य बताने से पहले बतानी होगी कार्यात्मक कमी: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने बाएं हाथ के जन्मजात विकार के आधार पर MBBS स्टूडेंट को मेडिकल शिक्षा के लिए अयोग्य घोषित करने वाली मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट खारिज की।

    हाईकोर्ट ने कहा कि केवल दिव्यांगता या शारीरिक विकार के आधार पर किसी स्टूडेंट को MBBS कोर्स के लिए अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। मेडिकल बोर्ड को यह स्पष्ट करना होगा कि छात्र में कौन-सी विशिष्ट कार्यात्मक कमी है और वह कमी मेडिकल कोर्स पूरा करने में किस तरह बाधा बनती है।

    जस्टिस नूपुर भाटी की पीठ ने कहा कि मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया कि याचिकाकर्ता कौन-सा विशिष्ट कार्य करने में सक्षम नहीं है। रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि उसके बाएं ऊपरी अंग की विकृति एमबीबीएस की पढ़ाई और प्रशिक्षण में किस तरह बाधा डालती है।

    अदालत ने कहा कि रिपोर्ट में सहायक उपकरणों और उचित सुविधाओं के माध्यम से स्टूडेंट को कोर्स पूरा करने की संभावनाओं का भी आकलन नहीं किया गया। इसके अलावा स्टूडेंट के दाहिने हाथ की कार्यक्षमता को भी ध्यान में नहीं रखा गया, जबकि उसका प्रमुख हाथ दाहिना था और वह पूरी तरह सक्षम था।

    मामला वर्ष 2023 की NEET-UG परीक्षा से जुड़ा है। परीक्षा के बाद याचिकाकर्ता को दिव्यांगता प्रमाणपत्र जारी किया गया। इसके बाद मेडिकल बोर्ड ने उसका दोबारा परीक्षण किया और बाएं ऊपरी अंग में विकृति का हवाला देते हुए उसे मेडिकल कोर्स के लिए अयोग्य बता दिया।

    याचिकाकर्ता ने इस रिपोर्ट को चुनौती देते हुए कहा कि मेडिकल बोर्ड ने उसकी किसी विशिष्ट कार्यात्मक कमी की पहचान नहीं की और न ही यह बताया कि उसकी दिव्यांगता MBBS कोर्स करने में किस तरह बाधा पैदा करती है।

    याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को यह भी बताया गया कि वह MBBS कोर्ट के थर्ड ईयर में पढ़ रहा है और पहले दो वर्ष की सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों परीक्षाएं सफलतापूर्वक पास कर चुका है।

    हाईकोर्ट ने मामले में सुप्रीम कोर्ट के ओंकार रामचंद्र गोंड बनाम भारत संघ के फैसले का भी उल्लेख किया।

    अदालत ने कहा कि दिव्यांगता संबंधी मेडिकल बोर्ड को सकारात्मक रूप से यह तय करना होगा कि अभ्यर्थी की दिव्यांगता संबंधित पाठ्यक्रम करने में बाधा बनेगी या नहीं। यदि बोर्ड का निष्कर्ष यह है कि अभ्यर्थी पाठ्यक्रम करने में सक्षम नहीं है, तो उसे ठोस कारण बताते हुए यह स्पष्ट करना होगा कि दिव्यांगता किस तरह और किस सीमा तक उसके लिए बाधा है।

    जस्टिस नूपुर भाटी ने कहा कि मौजूदा मामले में मेडिकल बोर्ड ने ऐसा कोई कारण नहीं दिया। बोर्ड ने केवल विकार का उल्लेख करते हुए स्टूडेंट को अयोग्य घोषित कर दिया। रिपोर्ट में स्टूडेंट की वास्तविक कार्यक्षमता और MBBS कोर्स की आवश्यकताओं के बीच कोई संबंध स्थापित नहीं किया गया।

    अदालत ने यह भी कहा कि दिव्यांगता का आकलन करते समय यह देखना जरूरी है कि क्या अभ्यर्थी आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों या सहायक साधनों की मदद से कोर्स पूरा कर सकता है। मौजूदा मामले में मेडिकल बोर्ड ने इस पहलू पर भी कोई विचार नहीं किया।

    हाईकोर्ट ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को अपूर्ण और कारणों से रहित मानते हुए याचिका स्वीकार की। अदालत ने स्पष्ट किया कि छात्र के दाहिने हाथ की पूरी कार्यक्षमता को नजरअंदाज करना भी महत्वपूर्ण कमी थी क्योंकि उसकी समस्या बाएं हाथ से संबंधित थी।

    इन आधारों पर हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को MBBS कोर्स जारी रखने के लिए पात्र माना और उसके खिलाफ मेडिकल बोर्ड द्वारा जारी अयोग्यता के निष्कर्ष को राहत प्रदान की।

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