फर्जी जन्म प्रमाणपत्रों से नाबालिग लड़कियों को बालिग दिखाने का 'खतरा': राजस्थान हाईकोर्ट ने अधिकारियों को दिए सख्त निर्देश

Amir Ahmad

10 Aug 2026 4:44 PM IST

  • फर्जी जन्म प्रमाणपत्रों से नाबालिग लड़कियों को बालिग दिखाने का खतरा: राजस्थान हाईकोर्ट ने अधिकारियों को दिए सख्त निर्देश

    राजस्थान हाईकोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं में नाबालिग लड़कियों को बालिग साबित करने के लिए फर्जी या नियमों के विरुद्ध जारी किए गए जन्म प्रमाणपत्र पेश किए जाने के बढ़ते मामलों पर गंभीर चिंता जताई। कोर्ट ने राज्य सरकार को ऐसे प्रमाणपत्र जारी होने पर रोक लगाने और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने के निर्देश दिए।

    जस्टिस महेंद्र कुमार गोयल और जस्टिस चंद्रशेखर शर्मा की खंडपीठ एक मां की ओर से दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता ने अपनी बेटी को नाबालिग बताया, जबकि प्रतिवादियों की ओर से दावा किया गया कि लड़की बालिग है। अपने दावे के समर्थन में एक जन्म प्रमाणपत्र भी पेश किया गया।

    जन्म प्रमाणपत्र की वास्तविकता पर संदेह होने के बाद हाईकोर्ट ने एडिशनल एडवोकेट जनरल से इसकी वैधता के संबंध में रिपोर्ट पेश करने को कहा। रिपोर्ट में सामने आया कि प्रमाणपत्र फर्जी और मनगढ़ंत था तथा इसे निर्धारित वैधानिक प्रावधानों के विपरीत जारी किया गया था।

    मामले पर गंभीर चिंता जताते हुए कोर्ट ने कहा कि हाल के दिनों में उसके सामने ऐसे कई बंदी प्रत्यक्षीकरण मामले आए, जिनमें लापता नाबालिग लड़कियों को बालिग दिखाने वाले जन्म प्रमाणपत्र सक्षम अधिकारियों द्वारा जारी किए गए बताए गए। जांच के दौरान इनमें से कुछ प्रमाणपत्र वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करके जारी किए गए पाए गए।

    कोर्ट ने कहा,

    “ऐसे मामलों को देखते हुए इस खतरे को शुरुआत में ही रोकने के लिए हम राजस्थान सरकार के मुख्य सचिव को निर्देश देते हैं कि वह मामले को देखें और संबंधित अधिकारियों को आवश्यक निर्देश जारी करें, ताकि वैधानिक प्रावधानों से हटकर या तथ्यों का उचित सत्यापन किए बिना लापरवाही से ऐसे जन्म प्रमाणपत्र जारी न किए जाएं।”

    हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव को यह भी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि ऐसे प्रमाणपत्र जारी करने वाले दोषी अधिकारियों के खिलाफ उचित विभागीय कार्रवाई की जाए। कोर्ट ने कहा कि एडिशनल एडवोकेट जनरल ऐसे मामलों की सूची मुख्य सचिव को उपलब्ध करा सकते हैं।

    कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह की कार्रवाई केवल प्रशासनिक लापरवाही तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) के तहत अपराध भी बन सकते हैं। इसके अलावा, फर्जी दस्तावेजों के माध्यम से अदालत को गुमराह करने का प्रयास न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप भी माना जा सकता है।

    मामले में एक और गंभीर पहलू सामने आया। याचिकाकर्ता की शिकायत के आधार पर फर्जी जन्म प्रमाणपत्र को लेकर FIR दर्ज की जानी थी, लेकिन बार-बार अनुरोध के बावजूद पुलिस ने FIR दर्ज नहीं की।

    इस पर हाईकोर्ट ने संबंधित जिला पुलिस अधीक्षक को हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने पूछा है कि संज्ञेय अपराध की जानकारी सामने आने के बावजूद FIR दर्ज नहीं करने पर उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए।

    हाईकोर्ट ने मामले को आगे की सुनवाई के लिए 11 अगस्त 2026 को सूचीबद्ध किया।

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