प्रोटेस्ट याचिका के आधार पर ही फाइनल रिपोर्ट खारिज नहीं कर सकता मजिस्ट्रेट: दुष्कर्म मामले में राजश्तान हाईकोर्ट ने रद्द किया संज्ञान आदेश

Amir Ahmad

22 Jun 2026 12:13 PM IST

  • प्रोटेस्ट याचिका के आधार पर ही फाइनल रिपोर्ट खारिज नहीं कर सकता मजिस्ट्रेट: दुष्कर्म मामले में राजश्तान हाईकोर्ट ने रद्द किया संज्ञान आदेश

    राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट केवल प्रोटेस्ट याचिका में लगाए गए आरोपों के आधार पर पुलिस की नकारात्मक अंतिम रिपोर्ट को खारिज कर अपराधों का संज्ञान नहीं ले सकता। ऐसा करने से पहले उसे जांच के दौरान एकत्र किए गए समस्त साक्ष्यों और सामग्री पर सार्थक विचार करना होगा तथा जांच अधिकारी के निष्कर्षों से असहमति के स्पष्ट कारण दर्ज करने होंगे।

    जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने दुष्कर्म के एक मामले में दो आरोपियों के खिलाफ लिए गए संज्ञान को रद्द करते हुए कहा कि संबंधित मजिस्ट्रेट के आदेश में न्यायिक मनन और विचार का अभाव दिखाई देता है। अदालत ने पुलिस की नकारात्मक अंतिम रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए आगे की कार्यवाही समाप्त की।

    मामले में दुष्कर्म का आरोप लगाते हुए FIR दर्ज कराई गई। जांच के बाद पुलिस ने आरोपों को पुष्ट नहीं पाया और निगेटिव फाइनल रिपोर्ट पेश की। इसके विरोध में परिवादी ने प्रोटेस्ट याचिका दाखिल की, जिस पर मजिस्ट्रेट ने अंतिम रिपोर्ट से असहमति जताते हुए आरोपियों के खिलाफ संज्ञान ले लिया था।

    हाईकोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट जांच एजेंसी के निष्कर्षों से बंधा नहीं होता और उसके पास निगेटिव रिपोर्ट के बावजूद संज्ञान लेने का अधिकार है। लेकिन ऐसा करते समय उसे जांच में सामने आए तथ्यों और साक्ष्यों का गंभीरता से मूल्यांकन करना आवश्यक है।

    अदालत ने कहा,

    "प्रोटेस्ट याचिका दाखिल होने मात्र से पुलिस जांच का महत्व समाप्त नहीं हो जाता और न ही अदालत अपने उस दायित्व से मुक्त हो जाती है, जिसके तहत उसे जांच के दौरान एकत्र सामग्री का मूल्यांकन करना होता है।"

    पीठ ने पाया कि मजिस्ट्रेट ने प्रोटेस्ट याचिका में लगाए गए आरोपों को लगभग पूरी तरह स्वीकार किया, जबकि जांच रिकॉर्ड पर उपलब्ध महत्वपूर्ण तथ्यों की अनदेखी की। आदेश में यह भी नहीं बताया गया कि जांच अधिकारी की कौन-सी निष्कर्षात्मक टिप्पणी गलत, रिकॉर्ड के विपरीत या कानूनन अस्वीकार्य थी।

    अदालत ने कहा कि केवल प्रोटेस्ट याचिका में आरोपों की पुनरावृत्ति को न्यायिक विचार-विमर्श का विकल्प नहीं माना जा सकता। यदि मजिस्ट्रेट जांच एजेंसी की राय से अलग निष्कर्ष पर पहुंचता है तो उसे इसके ठोस और तर्कसंगत कारण दर्ज करने होंगे।

    जस्टिस फरजंद अली ने कहा कि जांच अधिकारी द्वारा सामने लाए गए तथ्य अभियोजन के मूल आधार को प्रभावित करते थे और किसी भिन्न निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले उनका गंभीर न्यायिक परीक्षण किया जाना चाहिए। ऐसा न करने से संज्ञान आदेश कानूनी रूप से कमजोर और अस्थिर हो गया।

    इन्हीं कारणों से हाईकोर्ट ने माना कि संज्ञान आदेश प्रासंगिक सामग्री पर विचार न करने तथा फाइनल रिपोर्ट से असहमति के कारण दर्ज न करने के कारण दोषपूर्ण है। इसके साथ ही अदालत ने संज्ञान आदेश रद्द किया और आरोपियों के खिलाफ जारी गिरफ्तारी वारंट वापस लेने का निर्देश दिया।

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