53 दिन की अवैध कैद पर राजस्थान हाईकोर्ट सख्त: तहसीलदार पर व्यक्तिगत रूप से 2 लाख का जुर्माना, जांच के आदेश
Amir Ahmad
19 Jun 2026 12:52 PM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने HIV संक्रमित व्यक्ति को रिहाई के आदेश के बावजूद 53 दिनों तक अवैध रूप से जेल में रखने के मामले में राज्य प्रशासन को कड़ी फटकार लगाते हुए संबंधित तहसीलदार पर व्यक्तिगत रूप से 2 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। अदालत ने मामले की उच्चस्तरीय जांच के भी आदेश दिए।
जस्टिस फरजंद अली और जस्टिस सुनील बेनीवाल की खंडपीठ ने इस घटना को शैतानी कृत्य करार देते हुए कहा कि यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि मानवीय पीड़ा के प्रति ऐसी असंवेदनशीलता है जो अदालत की अंतरात्मा को झकझोर देती है।
अदालत ने टिप्पणी की,
"जब राज्य का एक अधिकारी अपनी हठधर्मिता के कारण एक बीमार और गरीब व्यक्ति को 53 दिनों तक अवैध कैद में रखता है, जबकि उसकी गंभीर रूप से बीमार पत्नी अधिकारियों के दरवाजे खटखटाती रहती है तब यह संविधान के मूल वादे के साथ घोर विश्वासघात है।"
मामला एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से जुड़ा था जिसे कैंसर से पीड़ित पत्नी ने दायर किया। याचिका में आरोप लगाया गया कि उसके पति को रिहाई का आदेश पारित होने के बावजूद 53 दिनों तक सिविल कारागार में अवैध रूप से बंद रखा गया।
रिकॉर्ड के अनुसार पति पर सरकारी भूमि पर अतिक्रमण का आरोप था, जिसके चलते उसे तीन माह के सिविल कारावास की सजा सुनाई गई। बाद में अपीलीय प्राधिकारी ने भूमि पर कब्जा छोड़ने के आधार पर सजा के प्रभाव पर रोक लगाई।
इसके बावजूद, संबंधित अधिकारियों ने उसे रिहा नहीं किया। मजबूर होकर उसकी पत्नी को हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। हालांकि, बाद में व्यक्ति को रिहा कर दिया गया लेकिन उसके मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के प्रश्न पर सुनवाई जारी रही।
अदालत ने कहा कि पति HIV से संक्रमित था और पत्नी कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रही थी। राज्य की कार्रवाई के कारण दोनों एक-दूसरे की देखभाल, सहयोग और साथ से वंचित रहे।
हाईकोर्ट ने कहा,
"एक कैंसर पीड़ित महिला का रिहाई आदेश लेकर तहसील कार्यालय के चक्कर लगाना हर स्तर पर गुहार लगाना और अंततः बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल करना फिर भी प्रशासन का आदेश न मानना, सार्वजनिक पद पर बैठे लोगों के लिए चेतावनी का उदाहरण होना चाहिए।"
अदालत ने कानून के शासन के मूल सिद्धांत पहले आदेश का पालन करो, बाद में अपील करो को रेखांकित करते हुए कहा कि किसी आदेश के खिलाफ अपील दायर कर देना अपने आपमें उस आदेश पर रोक नहीं लगाता। तहसीलदार अपने उच्चाधिकारी द्वारा पारित आदेश का पालन करने के लिए बाध्य था।
तहसीलदार की इस दलील को भी अदालत ने खारिज किया कि उसे रिहाई के आदेश की जानकारी नहीं थी। अदालत ने कहा कि जब बार-बार रिहाई की मांग की गई, हाईकोर्ट में याचिका दायर हुई और अधिकारी को आदेश की जानकारी भी थी तब अज्ञानता का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
खंडपीठ ने कहा,
"जो अधिकारी वैध स्थगन आदेश, बार-बार की गई रिहाई की मांग, हाईकोर्ट में लंबित याचिका और स्वयं की जानकारी के बावजूद किसी व्यक्ति को अवैध रूप से कैद में रखता है, वह यह नहीं कह सकता कि उसका आचरण अनजाने में हुआ।"
अदालत ने स्पष्ट किया कि मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर दिया जाने वाला मुआवजा कोई दान नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व है। जब व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन होता है तब मुआवजा ही न्याय की वास्तविक अभिव्यक्ति बनता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि ऐसे मामलों में दोषी अधिकारियों को व्यक्तिगत जवाबदेही से बचाया जाता रहा तो वे यह मानने लगेंगे कि राज्य उनकी ढाल है और नागरिकों के मौलिक अधिकार उनके खिलौने हैं।
तहसीलदार के आचरण को अभूतपूर्व हठधर्मिता बताते हुए अदालत ने उस पर व्यक्तिगत रूप से 2 लाख रुपये का जुर्माना लगाया, जो पीड़ित व्यक्ति को मुआवजे के रूप में दिया जाएगा।
अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा,
"ऐसा अधिकारी केवल राजस्व प्रशासन पर बोझ नहीं है, बल्कि नागरिक समाज, संवैधानिक व्यवस्था और जवाबदेह शासन की अवधारणा के लिए खतरा है।"
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने अतिरिक्त मुख्य सचिव (राजस्व) को किसी वरिष्ठ अधिकारी से जांच कराने का निर्देश दिया। साथ ही जांच पूरी होने तक संबंधित तहसीलदार को फील्ड पोस्टिंग से हटाने का आदेश भी दिया गया।

