गंभीर बीमारी से जूझ रहे आजीवन कारावास भुगत रहे दोषी को राहत, राजस्थान हाईकोर्ट ने सजा निलंबित कर दी जमानत
Amir Ahmad
20 Jun 2026 3:01 PM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे दोषी को बड़ी राहत देते हुए उसकी सजा निलंबित कर जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। दोषी गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी गिलियन-बारे सिंड्रोम से पीड़ित है। हाईकोर्ट ने कहा कि न्याय व्यवस्था को मानवीय गरिमा से अलग नहीं किया जा सकता और ऐसे मामलों में मानवता तथा संवैधानिक मूल्यों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
जस्टिस फरजंद अली और जस्टिस सुनील बेनीवाल की खंडपीठ ने कहा कि केवल बीमारी के आधार पर सजा निलंबित नहीं की जा सकती, लेकिन जब कोई दोषी ऐसी गंभीर और लगातार बढ़ने वाली बीमारी से ग्रस्त हो, जिससे उसकी शारीरिक क्षमताएं काफी प्रभावित हो जाएं और उसे निरंतर देखभाल की आवश्यकता हो, तब अदालत को आपराधिक न्याय और मानवीय गरिमा के बीच संतुलन स्थापित करना पड़ता है।
अदालत ने अपने आदेश में कहा,
"न्याय का प्रशासन मानवीय गरिमा के विचारों से अलग नहीं है। यदि कोई दोषी ऐसी गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी से पीड़ित है, जिससे वह निरंतर सहायता और देखभाल पर निर्भर हो गया हो, तो अदालत का दायित्व है कि वह न्याय की मांगों और मानवीय गरिमा की संवैधानिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाए।"
दोषी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। उसकी ओर से सजा निलंबन के लिए यह तीसरी याचिका दायर की गई।
सुनवाई के दौरान बताया गया कि दोषी को गंभीर हृदय संबंधी समस्याएं हैं और वह कई महत्वपूर्ण न्यूरोलॉजिकल शल्यक्रियाओं से गुजर चुका है। बीमारी के कारण उसे लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा, नियमित फिजियोथेरेपी, सहायक उपचार और लगातार चिकित्सकीय निगरानी की आवश्यकता है।
यह भी अदालत के समक्ष रखा गया कि मुकदमे की सुनवाई के दौरान और दोषसिद्धि के बाद भी उसे चिकित्सा आधार पर लगभग 13 बार अस्थायी राहत दी गई। इस दौरान उसके द्वारा स्वतंत्रता के दुरुपयोग का कोई आरोप सामने नहीं आया।
खंडपीठ ने कहा कि ऐसी गंभीर बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को अनावश्यक पीड़ा में छोड़ना मानवीय मूल्यों के अनुरूप नहीं होगा, जबकि उपयुक्त शर्तों के माध्यम से उसकी अदालत में उपस्थिति सुनिश्चित की जा सकती है।
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि उसके समक्ष बड़ी संख्या में लंबित आपराधिक अपीलें हैं और इस मामले की शीघ्र सुनवाई की संभावना फिलहाल नहीं है। ऐसे में, जब अपील में विचारणीय मुद्दे मौजूद हैं और सुनवाई में देरी दोषी की वजह से नहीं है, तब उसका लगातार जेल में रहना उचित नहीं होगा।
अदालत ने कहा कि मामला केवल मेडिकल उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि अपील लंबित रहने के दौरान दोषी को मानवीय और गरिमापूर्ण जीवन उपलब्ध कराने का भी है।
सभी परिस्थितियों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने सजा निलंबित करने की याचिका स्वीकार कर ली और अंतिम निर्णय होने तक दोषी को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया।

